सोमवार, 24 अप्रैल 2023

नामांकित लघुकथा इंदुमती श्री स्मृति लघुकथा विधा सम्मान वर्ष 2023

    विवाह की एक सही उम्र होती है। यह समझना भी आवश्यक है। 

पढ़िए अर्विना गहलोत की लघुकथा तन्हाई 

          सृजना आफिस के लिए तैयार हो ही रही थी कि माँ ने उसे पुकारा।

  ‘मां जल्दी कहो क्या कहना है?’

   ‘बेटा ललिता मौसी का फोन आया है। उन्हें क्या जवाब देना है?’

     ‘मां आप समझती क्यों नहीं? आपसे पहले भी कई बार तो कह चुकी हूँ। मुझे अभी शादी नहीं करनी है, अभी अभी मैंने नौकरी ज्वाइन की है। आप है कि जब देखो शादी की रट लगाए रहती हैं।’ 

      ‘बेटा कुछ तो खयाल करो तुम्हारे पापाजी का इसी साल रिटायरमेंट है। मैं चाहती हूँ, रिटायर होने से पहले तुम्हारे हाथ पीले कर दूंँ।’

    ‘तुम हो कि कुछ समझना ही नहीं चाहती हो।’

        ‘ये क्यों भूल जाती हो कि तुम्हारी एक छोटी बहन भी तो है? उसकी पढ़ाई भी पूरी हो गई है। हमें उसका भी तो ब्याह करना है।’

        ‘माँ! ये भी हो सकता है मेरे ससुराल वालों को मेरा नौकरी करना पसंद ही ना आए। मैं इस नौकरी को गंवाना नहीं चाहती। मुझे आजाद जिंदगी जीना पसंद है, बंधन में बंधना नहीं चाहती।’ 

      ‘सृजना तुमने जब शादी नहीं करने का फैसला कर ही लिया है, तो ठीक है। मेरा तो यही ख्याल है कि सही उम्र में  शादी ब्याह के कार्य सम्पन्न हो जाए, बाकी तुम जैसा उचित समझो। ऐसा ना हो तुम्हे अपने इस निर्णय पर बाद में पछताना पड़े। फिर न कहना समझाया नहीं था।’ 

         ‘मां! सुनो आप मौसी को मना कर देना, मैं दफ्तर के लिए निकल रही हूँ।’ 

      ‘ठीक है, अपना ख्याल रखना।’

     उसके पापा रिटायर होने के बाद बीमार रहने लगे। छोटी बहन का ब्याह हो गया। सृजना अपने कमरे में जब भी तनहा होती है यही सोचती है- ”मेरे दिल की बात सुनने वाला कोई तो हो। मन करता है मुझे भी कोई चाहने वाला हो, लेकिन किससे कहूँ? क्या पता था एक  दिन अकेलापन काटने को दौड़ेगा? 


                   अर्विना गहलोत

                   नागपुर महाराष्ट्र