अन्न देवता का रहस्य पढ़िए डॉक्टर ज्ञानप्रकाश पीयूष की लघुकथा अन्न देवता में
आनंद गिरि महाराज की पुण्यतिथि पर सत्संग, भजन, एवं कीर्तन के उपरांत भंडारे का आयोजन चल रहा था।
गद्दी-नशीन महाराज मुक्तानंद जी के वे शब्द भक्तों के कानों में गूँजने लगे जो उन्होंने प्रवचन के अंत में सार रूप में कहे थे- "अन्न देवता है, उसका सम्मान करें। थाली में उतना ही लें जितनी भूख है। भंडारे का उद्देश्य भूखे-प्यासे प्राणियों की मदद करना है तथा गुरु महाराज के प्रसाद से मन को पवित्र बनाना है, जो भक्तगण इन नियमों का पालन करेंगे, वे सदैव स्वस्थ और नीरोग रहेंगे। गुरु महाराज का आशीर्वाद उनके सिर पर सदा बना रहेगा।"
थाली में उतना ही लें, जितनी भूख है। यह बात तो सुरजीत के समझ में आ गई। पर अन्न देवता है, यह बात उसके गले के नीचे नहीं उतरी। अतः उसने अपने ताया जी से पूछा, "ताया जी, अन्न को देवता कहते हैं, यदि अन्न देवता है तो हम उसे खाते क्यों हैं?"
"चल पगले, यह अर्थ गलत है। अन्न को देवता सम्मान से कहते हैं। देवता का अर्थ देने वाला। अन्न हमें स्वास्थ्य देता है, हमारी भूख मिटाता है। अन्न से रस, रक्त, ऊर्जा और शक्ति मिलती है। इस भाव में अन्न को हम देवता कहते हैं।"
अपने ताया जी से "अन्न देवता" का रहस्य जान कर सुरजीत के मन की कली खिल उठी।
श्री डॉ. ज्ञानप्रकाश 'पीयूष'
विद्यावाचस्पति
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