शनिवार, 29 अप्रैल 2023

नामांकित लघुकथा इंदुमती श्री स्मृति लघुकथा विधा सम्मान वर्ष 2023

जाने अनजाने में हुई गलतफ़हमी हमें कहा तक ले जा सकती है। जानने के लिए पढ़िए 

बबिता कंसल की  लघुकथा 

दो घन्टें 

        आज अदालत में जज सहाब नें अपना फैसला सुनानें से पहले दोनों को दो घन्टों का समय दिया। आखरी फैसले से पहले, एक अवसर हैं अभी भी समय रहते आप अपनें बीच की जो भी गलतफहमी रही,उसे सुलझा लो। 

       दोनों एक साथ अदालत के कम्पाउन्ड में  एक दूसरें की ओर मुख कर बैठे थें। पर कोई भी बोलनें की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। बोलते भी कैसे.....?

       अदालत में  ग़लत आरोप जो एक दूसरे पर ये जानते हुए लगाये थे, कि दोनों ही ऐसे नहीं है। जैसा की अदालत में वकील ने दोनों पक्षों की तरफ से आरोप लगायें थे। जो निहायत ही एक दूसरे को नीचा दिखाने वाले थे।

      दोनो बैठ आंखें चुराते हुए अपने मोबाईल देखनें लगे। तभी राधा के मोबाईल पर मैसेज की टन.. से घन्टी बजी  मैसेज रवि का था।

        "राधा ! क्या तुम इस अलग होनें की बात से खुश हो?"

        "नहीं मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था।" राधा ने जवाब में लिखा। 

     "सोचा तो मैंने भी नहीं था, एक छोटी- सी बात हमें यहां तक पहुंचा देगी। अदालत में सब के सामनें हमें यूं नीचा देखना पड़ेगा।" रवि का मैसेज आया 

     "मम्मी पापा ने कितनें ठाठ बाट के साथ हमारी शादी की थी...।" 

         "सारी गलती तुम्हारी थी। कभी  तुमने  मुझें नहीं समझा। अगर थोड़ा सा समय निकालते मेरे लिए तो ये सब.....।" राधा का जवाब आया।  

     "क्या......? सारी गलती मेरी रही?  तुम्हारी कुछ नहीं ....?" 

    याद हैं, मैं जब भी ऑफिस से आता था, तुम तब भी मोबाईल पर खेलती रहती थी।थका हुआ आता था, तो आकर मन होता था, तुम से बात करनें का तुम्हें घुमानें ले जाने का पर तुम को  हमेंशा मोबाईल पर देख मुझें ग़ुस्सा आ जाता था। मुझें लगता तुम पूरे दिन तो घर में ही हो, फिर इस समय भी मोबाईल और मेरी चिड़चिड़ाहट घर में कलह का कारण बनती थी, इसी कारण चुप रहकर अपना समय मोबाईल या कोई काम लेकर बैठ जाता था।" रवि का मैसेज था

       "पर मैं तो समझी थी, तुम मुझें समय ही नही देना चाहते हो।" 

      "उस दिन भी मैं इसी कारण नाराज़ होकर घर से चली गयी। तब तुम लेट आये थे। जबकि तुम को तो पता था, हमें फिल्म देखनें जाना हैं हमेशा  जल्दी आनें का कह कर तुम उस दिन और भी देर से आते थे। तब मैं  भी  गुस्से में मोबाइल लेकर बैठ जाती थी।" राधा का मैसेज आया 

     "ओह तो ये बात थी, उस दिन ऑफिस में  बाॅस का काम भी करना पड़ा, बाॅस के रिश्तेदार अस्पताल में एमर्जेन्सी में थे। ओर वो उसे देखनें चले गये थे।" 

      "फोन की बैट्री भी डाउन हो गयी थी। मैं फोन भी नहीं कर पाया। और वापसी में ट्रैफिक जाम के कारण और भी लेट है गया।"

      "ओहो! तो ये बात थी, मैं,तो कुछ और ही समझ बैठी।" 

      अचानक ही राधा मोबाईल छोड़ रवि की ओर देखकर बोली। 

        रवि भी मोबाईल छोड़ उसे सारी बात  बतानें लगा। 

      तभी वकील ने आ कर कहा "आपका समय समाप्त हो गया हैं। जज साहब के फैसले के लिए, अब अदालत में पेश होना हैं।" 

     राधा और रवि दोनों हाथों में हाथ लेकर साथ में अदालत में हाजिर हुए। अदालत में सब की निगाहें उन दोनों को ही देख रही थी ।

      दोनों को साथ  देखकर जज साहब भी मुस्कुराये बिना न रह सके। 

              बबिता कंसल