जीवन में कभी कुछ, अच्छा न लगते हुए भी करना होता है। पढ़िए मधु जैन की मार्मिक लघुकथा पालनहार।
लघुकथा
पालनहार
सूरज आँखें दिखा रहा था और मेरी आँखें ग्राहकों का इंतजार कर रही थीं। खाली बैठे- बैठे झपकी आने लगी थी। तभी सड़क पर हो रही हलचल पर नजर गई। खानाबदोश परिवार अपने करतब दिखाने की तैयारी कर रहा था। पीठ पर बच्चे को बांधे महिला ढोलक बजा रही थी। पुरुष झांझर बजाते हुए गाना गा रहा था। और छोटी सी बच्ची गाने पर ठुमके लगा रही थी।
लोगों का ध्यान बच्ची पर नहीं, दस बारह फीट ऊंची बंधीं पतली सी रस्सी पर करतब दिखाते बालक पर था। बालक दस वर्ष के लगभग का दुबला-पतला था। सभी सांस रोके उसके हैरतअंगेज खेल का आनंद ले रहे थे। करतब खत्म होते ही लोगों के हाथ जेबों पर पहुँच चुके थे।
अब वे लोग बाजू वाली दुकान के शेड़ के नीचे खाना खाने बैठ गये। मेरा ध्यान उन्हीं पर था।
मैंने राहगीरों के लिए एक मटके में पानी भरकर दुकान के बाहर रखा हुआ था।
खाना खाने के बाद वह बालक पानी लेने आया तो मैंने पूछा।
"तेरा नाम क्या है ?"
झट से बोला "मंगू"
"तू तो बहुत बढ़िया करतब दिखाता है। कहाँ से सीखा ?"
"अपने बड़े भैय्या से।"
"कहाँ है वो ?"
"वो नहीं है! रस्सी से गिरकर मर गया।" कहते हुए उसकी आँख भर आई।
बात को बदलते हुए मैंने कहा "तू इतना कम खाना क्यों खाता है, जबकि मेहनत बहुत करता है।"
सिर झुकाए हुए बोला " ज्यादा खाऊँगा तो वजन बढ़ जाएगा, करतब कैसे दिखाऊंगा ?"
"तुझे करतब दिखाना अच्छा लगता है।"
"नहीं! पर मैं करतब नहीं दिखाऊंगा तो सबका पेट कैसे भरेगा?"
उससे बातें करते- करते मैं भावुक हो उठा था। मैंने उसे दस का नोट दिया।
"करतब के पैसे तो अपने दे दिए थे।"
"इतनी देर तुझसे बातें की न उसके पैसे हैं।"
पैसे लेते हुए उसके चेहरे की क्षणिक मुस्कान ने मेरा दिल जीत लिया।
मधु जैन
मधु जैन
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