बेटों की अनदेखी की चर्चा पर मिश्रा जी ने क्या कहा ? जानने के लिए पढ़िए भारती कुमारी की लघुकथा अनमोल।
10 वर्ष पूर्व एक ही पद और कार्यालय से सेवानिवृत्त दोनों मित्र सुबह- शाम की सैर में पार्क में बैठ दुनिया - जहान की बातें करते। राजनीति, फिल्म, साहित्य हर विषय पर चर्चा होती।
शर्माजी के दोनों बेटों में एक विदेश में बस चुका था और दूसरा साथ रहकर भी अलग था। दोतल्ले मकान में नीचे शर्माजी पत्नी के साथ,ऊपर बेटा सपरिवार। मिश्राजी का एकमात्र पुत्र दस वर्ष पूर्व शिकागो में बस गया, दो - तीन साल में एक बार 'भारत-दर्शन' को आते।
शर्माजी प्राय: अपने दोनों बेटों की अनदेखी की चर्चा करते,पर मिश्रा जी हमेशा इस मुद्दे पर मौन ही रहते। आज मन नहीं माना तो पूछ ही लिया- तुम्हें अपने बेटे से कोई शिकायत नहीं?
मिश्रा जी मुस्कुराते हुए बोले- मुझे कॉलेज में एक लड़की से इश्क हुआ, उसे प्रेम - पत्र लिखता , फाड़ता। उसे देखने के बहाने ढूंढ़ा करता। जिस दिन पता चला वो भी मुझे चाहती है, पागल जैसा हो गया। वैसा एहसास,वो पागलपन फिर किसी के लिए महसूस नहीं किया, शायद पहली बार था, इसीलिए। मुझसे ज्यादा रसूख वाले के लिए उसने मुझे छोड़ा..'
"क्या यार तुम भी, क्या पूछा क्या बता रहे हो?"
"मेरे दिल से कभी उसके लिए बद्दुआ नहीं निकली। क्यूंकि उसने जो एहसास दिए वो अनमोल है। जब बेटे को पहली बार गोद में लिया था,वो एहसास आज भी अनमोल है। उसे गोद में लेते ही मैं जिम्मेदार पिता के साथ जिम्मेदार बेटा भी बन गया था। इतनी खुशियाॅं जो मेरे बेटे ने जीवन में आकर दिया है, वो अनमोल है।"
भारती कुमारी
गुरुग्राम हरियाणा
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भारती कुमारी
