बाल प्रेम और प्रौढ़ प्रेम में क्या-कुछ अंतर है? पढ़िए सेवा सदन प्रसाद जी की लघुकथा
प्रौढ़- प्रेम
यह एक शाश्वत सत्य है कि पुरुष और स्त्री को आजीवन एक दूसरे की जरूरत रहती है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। लेकिन जीवन के इस पड़ाव पर राधा एवं गोपीचंद दोनों अधूरे हो गये थे।
हर शाम घड़ी में छः बजते, राधा के पांव पार्क की ओर बढ़ चलते। गोपीचंद तो पहले से ही पहुंच कर पत्थर की कुर्सी पर बैठ जाते और बगल वाली कुर्सी पर अपनी छङी रख देते ताकि कोई और आकर बैठ न जाए।
अचानक गोपीचंद को राधा आती हुई दिखी। तब वह कुर्ते की जेब से रूमाल निकाल कर पत्थर की कुर्सी को पोंछने लगे। राधा रोज की इस प्रक्रिया को देखकर मुस्कुरा पड़ी। फिर उसके लिए आरक्षित रखी गई पत्थर की कुर्सी पर बैठ गई।
गोपीचंद ने अपनत्व जताते हुए पूछा-- "आज देर हो गई?"
"हां! पड़ोसी महिलाओं के संग मीना बाजार चली गई थी। अचानक जब घड़ी पे नजर पङी तो सीधे पार्क चली आई।"
" इस बैग में क्या है?"
फिर राधा ने एक - एक कर सारा सामान सामने रख दिया - एक रूमाल, एक कलम, एक डायरी और छङी के लिए एक चांदी की मूठ।"
"तुम्हारा तो इस दुनिया में न कोई भाई है, न मामा, न काका और न ही तुम्हारा - - "
"पता नहीं, सब कुछ न कुछ खरीद रही थीं। बस मैंने भी यह सब खरीद लिया।"
और उसके चेहरे पर छा गयी एक बाल सुलभ मुस्कान।
गोपीचंद बस गौर से देखते ही रहे। इन सारी चीजों की तो उन्हें जरूरत थी ही।
* सेवा सदन प्रसाद
सेवा सदन प्रसाद
