शनिवार, 28 मार्च 2026

 

जन्म : 19 जनवरी 1961,  भोपाल - मध्यप्रदेश
शिक्षा : हायर सेकेंडरी

सम्प्रति : मध्यप्रदेश वन मुख्यालय भोपाल मे  सहायक

लघुकथा यात्रा :
विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं तथा कुछ साझा लघुकथा संकलन में लघुकथाएं प्रकाशित

पता : एच ए 118/71 , शिवाजी नगर , भोपाल - 462016 मध्यप्रदेश

1.नीला गुलाब
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विजेता , वीरेंद्र के बगलवाली सीट पर आकर बैठी , वीरेंद्र ने गाडी स्टार्ट की और चल पड़ी होटल मधु विहार ! वीरेंद्र गुन गुना रहा था , ये शाम मस्तानी .......
विजेता मंद - मंद मुस्करा रही थी !
पार्टी पुरे शबाब पर थी, रात के ११ बज चुके थे ! विजेता ने कहा : वीरेन्द चलो अब घर ! आज पहली बार विजेता को वीरेंद्र ऐसी पार्टी में लाया था ! वे दोनो बाहर आकर कार में बैठ गए ! विजेता ने अपना पर्स पीछेवाली सीट पर उछाल दिया ! उसमे रखा नीला गुलाब का फूल भी बाहर उछल पड़ा और मुस्कराने लगा !
वीरेंद्र की नजर उस पर पड़ी !
वीरेंद्र ने पूछा : विजेता ये नीला गुलाब तुम्हारे पास कैसे आया !
ये मुझे आपके परिचित मनीष ने दिया है ! विजेता ने सहज कहा !
वीरेंद्र का पारावार नहीं रहा ! तू भी हराम ......... ! उसने दिया , और तुमने ले के रखा लिया ? फेक देती उसके मुंह पर !
देख लूंगा उस साले मनीष को भी !
अब सिर्फ कार की आवाज आ रही थी ! 15 मिनिट बाद कार पोर्च में शांत हुई ! वे दोनों फ्लेट में दाखिल हुए !
विजेता बड़ बड़ाई : अब मेरी क्या गलती है !
वीरेंद्र के कानो में पारा घुल गया ! उसका हाथ लहराया, विजेता के शरीर पर पड़ने ही वाला था कि न जाने कहा से विजेता के हाथो में बल आ गया और उसने कस कर वीरेंद्र का हाथ पकड़ा और पूरी ताकत से उसे दूर धकेल दिया !
पास में पड़े स्टूल पर वीरेंद्र जा कर बैठ गया !
कमरा नीले गुलाब कि खुशबु से महक रहा था ! ****

2.असमंजस
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" ताजा खबर , अख़बार ले लो सेठ जी ! "
" ठीक है एक रुपया दूंगा ! "
" दो रूपये का है ! "
" मै जानता हूँ , तुझे तो ये कंपनी से मुफ़्त मिलते है ! "
" तू कामचोरी तो नहीं कर रहा सो ले लेता हूँ , वार्ना लेता भी नहीं ! "
" एक रुपया लेकर , अख़बार देकर लड़का चलता बना "
अख़बार लिया है तो पढ़ना भी चाहिए .... ....... न !
पहला पेज उप चुनाव में सत्ता पक्ष की करारी हार !
दूसरा पेज असहिष्णुता पर प्रदर्शन !
तीसरा पेज एटीएम से गिरोह ने रूपये निकाल लिए !
चौथा पेज महिला का मंगलसूत्र ले कर भागे लुटेरे !
सेठ का मन कसेला हो गया ,अख़बार को मोड़कर वह बुदबुदाया क्यों ले लिया मैने यह अखबार ! ****

3.संवेदना
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सिटी मॉल के करीब गाड़ी पार्क कर , अपना झोला लिए , उन्मुक्त मैं आगे बढ़ जाता हूँ !
मैं जानता हूँ ! मॉल के गार्ड की नजरें मेरा पीछा कर रही है !
आगे एक सब्जी की दुकान है , विभिन्न सब्जियाँ सजाकर रखी गई है ! पानी का छिड़काव हो रहा है !
एक आवाज मेरे कानो से टकराती है ' आइये सर !'
मैं अनसुना कर आगे बढ़ जाता हूँ !
बिल्डिंग के छज्जे के नीचे एक महिला सब्जी का ठेला लिए खड़ी है ! पास ही प्लास्टिक के स्टूल पर एक वृद्ध बैठा है !
मैं ठेले पर रखी सब्जियों का मुआयना करता हूँ !
महिला और वृद्ध की आँखों में झाँकता हूँ !
उनकी आँखो में मुझे उल्लास और आशा परिलक्षित होती है !
अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ सब्जियाँ तुलवाकर मैं अपने झोले में भरवा लेता हूँ !
फिर रूपये गिनकर वृद्ध की हथेली पर रख देता हूँ !
मैं देख रहा हूँ ! वृद्ध का हाथ ऐसे उठ रहा है , जैसे आशीर्वाद दे रहा हो ! ****

4.हृदय परिवर्तन
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अरे ! वीरू की माँ , काहे फ़िकर करे हो ! तेरे पेट से जन्मा है, भरोसा रख बेटे पर !
सज्जन सिंह ने अपनी पत्नी से कहा !
ना ! अब न बचूंगी !
वह पेट दर्द से कराह रही थी !
माता - पिता ने अपने बेटे का व्यवसाय ज़माने के लिए ,पूरी ज़मीन बेच कर , राशि अपने बेटे को दे दी थी ! अब उनका आय को कोई साधन नहीं था !
कुछ दिनों तक बेटे ने परवरिश की फिर न जाने क्या सूझी की मंदिर के पास एक झोपडी बना कर उन्हें वहां छोड़ आया !
तब से वीरू की माँ की नींद उड़ गयी थी !
सज्जन सिंह की बात का उनकी पत्नी पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा !
पेट का दर्द मेरी जान ले के ही छोड़ेगा ! खैराती अस्पताल वाले क्या समझे है ?
गैराज से बाईक निकलते हुए , वीरू ने माँ की आवाज सुन ली , उसके " हृदय में हलचल " हुई !
वह झोपड़ी में आया और माँ से बोला " तैयार हो जा माँ , आयुष्मान अस्पताल में डॉक्टर श्रवण से चेकअप कराना है ! " ****

5.संतोष
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रात्रि में घडी ने आठ घंटे बजाये !
बद्री प्रसाद जी ,डाइनिंग टेबल के करीब रखी कुर्सी पर विराजमान हो गए !
बहु सुनीति ने भोजन की थाली परोस दी !
बद्री प्रसाद जी ने रोटी का कोर सब्जी में डुबोया , अब मुँह में डालने ही वाले थे की सहसा रुक गए !
बद्री प्रसाद जी को बचपन से आदत है , वे भोजन की थाली में मीठा लेकर ही भोजन करते है !
" बहु ! आज थाली में मीठा रखना भूल गई ? "
" बाबूजी ! अब आठ हजार रूपये पेंशन से , थाली में रोज गुलाब जामुन रखना सम्भव नहीं है ! "
" क्यों भला ? मुझे तो अठ्ठाइस हजार रूपये पेंशन मिलती है ! "
तभी कार की रोशनी से मकान जगमगा उठा ! कार की हेड लाईट भोजन की थाली पर पड़ी ,प्रकाश परावर्तित हो कर बद्री प्रसाद जी के चेहरे पर आया !
पल भर के लिए उनकी आँखे रोशनी से चुंधिया गई !
अब गाड़ी की लाईट बंद कर दी गई थी !
ठक . ठक .ठक . ठक . पद चाप सुनाई दे रही थी !
संतोष कमरे में दाखिल हुआ !
सुनीति कमर पर हाथ रखे खडी थी !
संतोष सारा मामला समझ गया !
" आप आ गए ! अब आप ही समझा दीजिये , बाबूजी को ! "
" बाबूजी ! मैंने आपको बताया तो था , हमने जो नई कार खरीदी है ! उसकी इजी मंथली इंस्टालमेंट इस माह से आपके पेंशन अकाउंट से कटना है ! सो बीस हजार रुपये कट गए है ! "
बद्री प्रसाद जी ने चीनी के डब्बे मे से चुटकी भर शक़्क़र निकालकर अपनी थाली में रखी !
सब्जी में भीगा हुआ रोटी का निवाला मुँह में रखकर वे चबाने लगे !  ****

6.मितव्ययता
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बाबूजी ने डाक में आया लिफाफा खोल कर पत्र पढ़ा !
पत्र पढ़कर बाबूजी ने कागज का नीचे का कोरा हिस्सा काट लिया !
यह देखकर पास में बैठा उनका बालक कौतुहल वश पूछ बैठा " बाबूजी ये कागज का आधा हिस्सा आपने क्यों काट लिया ? "
बाबूजी ने बताया " इस कोरे बचे हुए कागज पर अब मै पत्र का उत्तर लिखूंगा !
बालक समझ गया कि बाबूजी उसकी किताब - कापियों का खर्च कैसे चलाते है ! ****

7.उधार
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           उसने बताया था। "वह इन दिनो तंगहाली मे जीवन बसर कर रहा है ! बिटिया की स्कूल  फीस जमा करना है।  2000 रुपयो की सख्त जरूरत है !"
        मेरा मन  बहुत व्यथित हुआ था।  मैंने  उसके चाहे अनुसार रुपये उसके खाते मे स्थानांतरित कर दिये थे !
           किसी समय वह मुझे रास्ते चलते मिल गया था !
आदर सहित उसने मेरा अभिवादन किया था!
         मैंने भी प्र्त्युत्तर दिया था!
आज फिर वह मुझे मिल गया ! नमस्कार का आदान - प्रदान हुआ ! 
          वह आगे बढ़ गया !
          मै उससे कुछ कहना चाह रहा था, किन्तु......... ! ***

8.ज़ज्बा 
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       मैं आज काफी अन्तराल के बाद सुमन के साथ बैठकर नाश्ता कर  रहा था। बीमारी और जीवन की आपाधापी में साथ रहते हुए भी ऐसे अवसर कम ही होते हैं।
          नाश्ता करते हुए सुमन रुक गई। उसने डॉक्टर  की दी हुई शुगर की टेबलेट मुँह में रखी और पानी का ग्लास उठाकर चार घुट पानी पी लिया। 
            मैं उसके चेहरे के उतार चढाव को नापने में लगा था।  थरथराहट  भरे हाथों से प्लेट उठाकर सुमन फिर नाश्ता करने में जुट गई थी।
         मै  अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था। 
      "सुमन : तुमने सुहास के सुझाव पर क्या निर्णय लिया?"
     " देखिए ! संतोष जी, सुहास और उसका परिवार जहां रहना चाहे रहे। हम भारत मे ही रहेंगे।"
हम आत्मनिर्भर थे, आत्मनिर्भर ही रहेंगे।  ****

9.वृद्धा आश्रम
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अरे नालायक !
कुछ लायकी रख |
हांडा जी ने अपने इकलोते बेटे आशीष को डाँटा |
किन्तु बेटे आशीष पर इसका कुछ असर दिखाई नहीं दिया |
वह अपनी दुनिया मे मस्त रहता |
जैसे तैसे जुगाड़ लगाकर पिता ने बेटे को सरकारी नौकरी मे लगा दिया , और सदा के लिया अपनी आँखे मूंद ली |
पिता के गुजरते ही बेटा सर्वेसर्वा हो गया |
माता सुमन देवी ने सोचा बेटे की शादी कर दु तो उसकी आदत मे कुछ सुधार हो, और उसकी धूम धाम से शादी कर दी गयी |
बहू आशा ने घर मे आते ही अपने पति पर लगाम कसना शुरू किया ,
और इतनी लगाम कसी की एक दिन बेटा आशीष न चाहते हुये भी अपनी जन्मदायिनी मा को वृद्धा आश्रम मे छोड़ आया | ***?

10.हेल्प प्लीज़
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राकेश बाइक पर सवार हो कर अपने गंतव्य की ओर जा रहा था ।
उसे सड़क के किनारे लाल सलवार सूट पहने एक युवती दिखाई पड़ी ।
राकेश के पास आते ही उस युवती ने हाथ उठा कर कहा - लिफ़्ट प्लीज़ ।
राकेश ने गाड़ी का ब्रेक दबाते हुए कहा - जरूर , बैठिये ।
गाड़ी रुकी , युवती गाड़ी पर बैठी , राकेश ने गाड़ी का एक्सीलेटर घुमाया , गाड़ी चल दी ।
कुछ ही दूर जाते ही दो बलिष्ठ युवक बाइक पर सवार आये और उन्होंने अपनी - अपनी बाइक राकेश की बाइक के सामने अड़ा दी ।
राकेश ने तुरंत ब्रेक दबाया किन्तु , गाड़ी का बेलेन्स संभल नहीं पाया और वह गाड़ी के साथ ही गिर पड़ा , साथ ही पीछे बैठी वह युवती भी गिर पड़ी ।
राकेश उठकर खड़ा हुआ तो उसने देखा , वे दोनों युवक उस युवती के पीछे लपके । राकेश को माज़रा समझते देर नहीं लगी । पास ही पुलिस स्टेशन था । राकेश ने गाड़ी स्टार्ट की और सरपट पुलिस स्टेशन की और दौड़ा दी । पुलिस स्टेशन के गेट पर पहुँचते ही राकेश के कानो में पुलिस कर्मियों के ठहाके सुनाई पड़े । राकेश के दिमाग में पुलिस के उलटे -सुलटे सवालो का ख़याल आया । राकेश ने गाड़ी स्टार्ट की और मुड़कर अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा । ****

11.अद्भुत
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       कर्मवीर जी लंबे समय से  ला इलाज  बीमारी से जूझ रहे थे।
जनसेवा में नाम तो भरपूर कमाया।
स्वस्थ्य थे तब जनसेवा में समय व्यतीत हो जाता था, पता ही  नहीं चलता था।
       जब भी उन्हें थोड़ा सा आराम मिलता, वह पत्नी से पूछ  ही लेते थे,  "किसी हितेषी का समाचार या  फोन आया ?"
       पत्नी  का हर बार  "ना" में ही उत्तर होता था।
      किसी समय कर्मवीर जी के शरीर ने सांसे छोड़ दी। वे देवलोक को  गमन कर गए।
      अब फोन की रिंग टोन बार बार बजती थी।
      संवेदना संदेश की भरमार थी। पत्नी फोन काल रिसीव  करते करते निढ़ाल हो जाती थी। ****
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