इंदुमति श्री स्मृति लघुकथा लिखिए योजना
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लघुकथाकार है श्री लाजपत राय गर्ग
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लघुकथाकार है श्री लाजपत राय गर्ग
150, सेक्टर 15, पंचकूला -134113
मो.92164-46527
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लघुकथा
काम भलाई का, परिणाम....?
रमणीक अपनी कार से पटियाला जा रहा था। मेन रोड पर थोड़ी दूर ही गया था
कि सामने कई गाड़ियां रुकी हुई दिखाई दीं। सोचने लगा, कहीं कोई एक्सीडेंट न हो
गया हो! कुछ ही क्षणों में सड़क के बीचों-बीच तीन-चार युवक हाथ हिला हिलाकर
कार को रोकने का आग्रह करते दिखाई दिए। इतने में रमणीक की नज़र सड़क-किनारे लगे शामियाने पर जा पड़ी, जिसके नीचे तीन-चार टेबलों पर हलवे का प्रसाद और चाय का सामान रखा हुआ था। बहुत से उत्साही नौजवान प्लास्टिक के दौनों में हलवा और थर्मोकोल के गिलासों में चाय लेकर सड़क पर आने-जाने वाले वाहनों को रोक कर यात्रियों को आग्रहपूर्वक हलवा और चाय दे रहे थे। न चाहते हुए भी रमणीक को कार रोकनी पड़ी। फुर्ती से दो लड़के कार की ओर लपके। कार का शीशा नीचे करवाया और चाय का गिलास तथा हलवे का दौना रमणीक की ओर बढ़ा दिया। रमणीक ने दौना बगल वाली सीट पर रखा और चाय का गिलास पकड़ते हुए पूछा - 'बेटे, यह सेवा किस खुशी में हो रही है?'
'बाबू जी, बाबे नानक देव दें पंज सो पंजावें प्रकाश पर्व दी खुशी 'च सेवा कर रहे आं।'
लड़के तो इतना कह कर दूसरी गाड़ियों की ओर चले गए। रमणीक ने देखा, सड़क
पर जगह-जगह खाली दौने और गिलास बिखरे हुए थे। वह सोचने लगा, क्या कोई इस कचरे को भी संभालेगा! उसने अपने खाली दौने और गिलास को क्रश करके गियरबॉक्स के पास रखा और आगे बढ़ लिया।
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लघुकथा
आश्रित
निरीक्षकों की हाज़िरी पुस्तिका जिला निरीक्षक के कमरे में रखी रहती
थी। जैसे-जैसे निरीक्षक ऑफिस में आते थे, अपनी हाजिरी लगाकर फील्ड में निकलने
से पहले वहीं बैठकर उस दिन किये जाने वाले काम की चर्चा तथा चाय की चुस्कियों
के साथ गपशप करते थे।
एक दिन सतविंदर सिंह ने आते ही पिछले दिन की अपनी कारगुज़ारियों की शेखी बघारनी शुरू कर दी बिना ध्यान दिए कि कमरे में एक अपरिचित अजनबी व्यक्ति भी बैठा है। उसे कुछ अधिक बोलते देखकर जिला निरीक्षक धनपत राय ने उसे सावधान करने के इरादे से टोकते तथा अपरिचित व्यक्ति की ओर संकेत करते हुए कहा - 'सतविंदर, तूने ध्यान नहीं दिया, ये मनोज जी हैं, विजिलेंस में इंस्पेक्टर।'
सतविंदर ने सत्ता के गलियारों में अच्छे सम्बन्ध बना रखे थे। उसने जिला निरीक्षक की चेतावनी को दरकिनार करते हुए कहा - 'की खास गल्ल है जनाब?' और साथ
ही मनोज की ओर हाथ बढ़ाते तथा अपनी बात पूरी करते हुए आगे कहा - 'असीं कुझ
गलत-सलत कराएंगे तांही ऐन्हां दी पुच्छ होउगी। क्यों, ठीक है ना मनोज जी?'
मनोज ने सतविंदर के बढ़े हुए हाथ से हाथ मिलाया, लेकिन बोला कुछ नहीं।
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लघुकथा
आशीर्वाद
संस्था द्वारा संचालित स्कूल का वार्षिकोत्सव। सरस्वती वन्दना के
पश्चात् एक अल्हड़ किशोरी ने मंचासीन संस्था-प्रमुख स्वामी जी के सम्मान में
स्वागत गीत प्रस्तुत किया। बालिका जितनी स्वयं सुन्दर थी, उतना ही मधुर था
उसका कंठ। गीत गायन के दौरान स्वामी जी बहुत ही प्रभावित लग रहे थे, क्योंकि
वे निरन्तर आहिस्ता-आहिस्ता सिर हिलाते रहे थे।
कार्यक्रम की समाप्ति पर स्वामी जी ने अपने अंतरंग सेवक को संकेत
से अपने पास बुलाया और धीमे स्वर में उसे आदेश दिया - 'जिस बालिका ने स्वागत
गीत गाया था, हम उसके मधुर कंठ से अति प्रसन्न हैं। तुम उस बालिका को हमारे
कक्ष में भेजो। हम उस बालिका को आशीर्वाद देना चाहते हैं।'
'जो आज्ञा महाराज', कहते हुए सेवक रहस्यमयी मुस्कान परिवेश में
बिखेरते हुए तत्परता से वहां से चला गया।
