मंजिल
गद्य - क्षणिका
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अंधेरा था, लेकिन उसने चलना शुरू किया ! उसकी परछाई साथ - साथ चल रही थी ! उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। वह चलता रहा ! परछाई दाये - बाये घूमती रही ! अनवरत चलते हुये वह बहुत आगे तक निकल आया ! परछाई भी उसके पीछे - पीछे आ रही थी ! अब रोशनी उसके सामने थी और पीछे परछाई बहुत बड़ी और गहरी हो गई थी !
उदय श्री. ताम्हणे
