अपने आसपास होते हुए नकारात्मक सामाजिक बदलाव से मन आहत तो होता ही है।
पढ़िए मधु जैन की लघुकथा
सांझ की बेला
राधा उठना चाह रही थी पर शरीर साथ नहीं दे रहा था। श्यामा से मिलने को मन बैचेन था।
अपने आप को इतना असहाय तो कभी महसूस नहीं किया था।
श्यामा का जन्म उसके ही सामने हुआ था। श्यामवर्ण माथे पर सफेद तिलक बड़ी-बड़ी मोहक आंखों ने सचमुच मन मोह लिया था। राधा ने श्यामा को कभी भी गाय न माना था। राधा तो श्यामा की मां थी और श्यामा, राधा के बच्चों की मां। श्यामा का खाना पीना और दुलार राधा की दिनचर्या का अभिन्न अंग था। बच्चे भी राधा की हिदायत के कारण आज भी उसे श्यामा न कहकर श्यामा मां ही कहते हैं। नाती पोतों ने भी श्यामा का दूध चखा है। पर अब श्यामा दूध नहीं देती बेटे को उसको खिलाना अखरने लगा है। पहले तो राधा वाॅकर की सहायता से आंगन तक पहुंच जाती थी और श्यामा की पीठ सहलाकर दोनों ही
खुश हो लेती थी। अब आंगन में किसी और का कब्जा है।
पोता गोलू कह रहा था "दादी पापा श्यामा मां को कहीं भेजने वाले हैं।"
सुनते ही मन चीत्कार उठा
"कहीं कसाई को...."
"नहीं! नहीं! ऐसा नहीं हो सकता।"
"बेटा, गोलू जो कह रहा क्या वह सच है।"
"हां मां।"
"बेटा अब तो उसकी खुराक भी कम हो गई है रहने दो न उसे यहीं।"
मिन्नत भरे स्वर मे कहा।
"जगह ख़ाली होगी तभी तो दूसरी गाय आ पाएगी।"
"लेकिन बेटा तुम उसका दूध पीकर ही बड़े हुए हो।"
मनाने की एक और कोशिश करते
हुए बोली।
"उसी दूध के कर्ज के कारण कसाई को नहीं दे रहा हूं!
गौशाला भेज रहा हूं।
वहां इसकी अच्छे से देखभाल हो सकेगी और खाना भी भरपेट मिलेगा।"
मां को उदास देखकर वह बोला।
"अरे! मां मैं कभी कभी उसे देख भी आया करुंगा।"
"श्यामा ने तो दस साल दूध पिलाया है और मैंने तो सिर्फ एक साल।"
सोचते ही मन अनजानी आशंका से घिर उठा।
मधु जैन
