शनिवार, 4 जुलाई 2020

माध्यम लघुकथाकार लाजपत राय गर्ग




लाजपत राय गर्ग की लघुकथा पढ़िए 

माध्यम 
 सितम्बर में ट्रांसफर होकर आये मधुप ने अपने साथ लगे निरीक्षक प्रफुल्ल कुमार को अपनी बेटी का स्कूल में दाखिला करवाने के लिये भेजा। कई वर्षों से यहां पदस्थ होने के कारण प्रफुल्ल कुमार की शहर में अच्छी-खासी जान-पहचान थी। स्कूल की प्रिंसिपल ने बच्ची के पिछले स्कूल की रिपोर्ट देखने के बाद प्रफुल्ल कुमार को कहा - 'इंस्पेक्टर साहब, बच्ची का रिकॉर्ड तो ठीक लगता है, फिर भी स्कूल के नियमानुसार हमें इसका दस मिनट का टेस्ट लेना होगा।' प्रफुल्ल कुमार के कुछ कहने से पूर्व ही बच्ची मालती बोली - 'मैम, मैं किसी भी तरह के टेस्ट के लिये तैयार हूं।' उसका आत्मविश्वास से भरा उत्तर सुनकर प्रिंसिपल मैम बोली - 'शाबाश बेटे।' और साथ ही उन्होंने सेवक को बुलाने के लिये बेल बजायी। सेवक के आने पर छठी कक्षा की अध्यापिका मिसेज सरीन को बुलाने का आदेश दिया। मिसेज सरीन के आने पर उसे आवश्यक निर्देश देकर मालती को उसके साथ जाने को कहा। लगभग पन्द्रह मिनटों के बाद मिसेज सरीन ने आकर अपनी रिपोर्ट प्रिंसिपल मैम के सामने रख दी। रिपोर्ट पर सरसरी निगाह डाल कर प्रफुल्ल कुमार को संबोधित कर प्रिंसिपल मैम ने कहा - 'इंस्पेक्टर साहब, बच्ची तो बहुत होशियार है। इसे एडमिट करके हमें खुशी होगी।' फिर मालती को देखते हुए कहा - 'बेटे, तुम इतनी इंटेलिजेंट हो और तुम्हारे पापा भी इतनी बड़ी पोस्ट पर हैं, फिर भी तुमने हिन्दी मीडियम क्यों चुना है, तुम तो इंग्लिश मीडियम भी आसानी से ले सकती थी?' मालती - 'मैम, मेरे हिन्दी मीडियम लेने का कारण है। मेरे पापा की ट्रांसफर कभी भी हो जाती है, साल के बीच में भी। हिन्दी मीडियम होने से मैं बिना किसी दिक्कत के नये स्कूल का कोर्स तथा किताबों को आसानी से बिना ट्यूशन के पढ़ लेती हूं। मेरे पापा ट्यूशन पसन्द नहीं करते और हिन्दी अधिक पसन्द करते हैं।' प्रिंसिपल - 'शाबाश। अपनी मातृभाषा के प्रति तुम्हारे पापा के प्रेम के बारे में सुनकर बहुत अच्छा लगा। मुझे विश्वास है कि तुम बहुत तरक्की करोगी।' 

लाजपत राय गर्ग, 
पंचकूला