मंगलवार, 30 जून 2020

बदलाव, मुझे एतराज़ नही लघुकथाकार ज्ञानप्रकाश पीयूष


लघुकथा

बदलाव

         नितिन भाई! मम्मा अब मुझे डाँटती नहीं है। उपहार भी लाकर देती है। होमवर्क में भी मदद करवाती है। मम्मा बहुत अच्छी हो गई है।

"हाँ बहन शालू ,  तू बिल्कुल ठीक कहती है। मैं भी ऐसा ही महसूस करता हूँ। मम्मा अब बहुत बदल गई है। चिड़चिड़ापन कहीं गायब हो गया है। हमेशा खुश रहती है। इसका क्या कारण हो सकता है?"

'अरे बुद्धू तू इतना भी नहीं जानता। डैडी  बहुत दिनों बाद घर आए हैं । कोरोना वायरस फैला है। डैडी ईरान से  भारतीय विमान से सकुशल घर लौट आए हैं।
 क्या तू खुश नहीं है?"

"हाँ,मैं तो डैडी के आने से बहुत खुश हूँ।"

"भैया , डैडी के यहाँ न रहने से मम्मा अपने आपको अकेला-अकेला महसूस करती थी। उनके सुख-दुःख की बात पूछने वाला भी तो कोई नहीं था। ऊपर से डैडी की चिंता उन्हें रात-दिन सताती थी।अतः हमेशा तनावग्रस्त -सी रहती थी। अपने आप से ही कुछ-कुछ बड़बड़ाती रहती थी। अब डैडी के आने से मम्मा का मानसिक तनाव दूर हो गया है। खुश रहती हैं। हमसे भी मीठा बोलती हैं। प्यार भी करती हैं।"

"शालू बहन, डैडी फिर से तो ईरान नहीं चले जाएँगे ?"
"ना ही जाएं तो अच्छा है।"नितिन ने कहा।
                          

ज्ञानप्रकाश 'पीयूष' 



लघुकथा

 मुझे एतराज़ नहीं

ज्ञानप्रकाश 'पीयूष'

    चोपड़ा जी ने जैसे ही पार्क में प्रवेश किया तो सामने बेंच पर गुमसुम बैठे
चड्ढा जी को देखा। उनके पास जाकर 'राम-राम' की और पूछा - 'चड्ढा जी! आज आप
अकेले खामोश क्यों बैठे हैं, सैर नहीं कर रहे? सब कुशल तो
है?'
'हाँ,सब कुशल है ।'
' फिर आप इतनी गम्भीर मुद्रा बनाए क्यों बैठे हैं?'
चड्ढा जी ने मुस्कराने की चेष्टा करते हुए कहा - ' चोपड़ा जी। रात को ढंग से
सो नहीं पाया, अब सैर करने का मूड नहीं
है, अतः बेंच पर बैठ गया।'
'नींद का ठीक से न आना किसी-न-किसी चिंता के कारण होता है। हम तो दोस्त हैं,
मुझसे अपनी मन:स्थिति साझा करोगे तो चिंता का समाधान निकल सकता है।' चोपड़ा जी
ने बड़ी आत्मीयता से कहा।
आत्मीयता की उष्मा पाकर चड्ढा जी को हौसला हुआ तो वे बोले - 'चोपड़ा जी, शीला
बिटिया की स्थिति से आप अनभिज्ञ नहीं हैं। उसने पढ़ाई पूरी कर ली है, अब उसके
विवाह की चिंता है। मेरे मन में विचार आया कि शीला का रिश्ता अपने मोहित बेटे
से हो जाए तो मेरे मन का बोझ हल्का हो सकता है।'
'चड्ढा जी, शीला बिटिया चाहे पोलियोग्रस्त है, किन्तु उसके गुणों को देखते हुए
उसे अपने घर की बहू बनाने में मुझे प्रसन्नता होगी, किन्तु बच्चों पर अपनी
पसन्द-नापसन्द थोपना अच्छा नहीं।' चोपड़ा जी की स्पष्टबयानी सुनकर चड्ढा जी ने
राहत की सांस ली, क्योंकि शीला उसे पहले ही संकेत दे चुकी थी कि मोहित और वह
एक-दूसरे को चाहते हैं।                          
ज्ञानप्रकाश 'पीयूष' 

ज्ञानप्रकाश 'पीयूष' आर.ई.एस.
पूर्व प्रिंसिपल,
1/258 मस्जिदवाली गली
तेलियान मोहल्ला,
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