वैश्विक महामारी ने मानवता को सबक सिखाया है।
बाहरी चमक धमक गौण है। आंतरिक सौंदर्य महत्वपूर्ण है। इसी पक्ष को उजागर करती हुई सीमा वर्मा की लघुकथा पढ़िए :-
दर्द-ए-दिल
आज दीदी फिर चमचमाती गाड़ी से आई थी। उसे देखकर मीना की आंँखें चुंधिया गईं।
गहनों से लदी दीदी उसे दुनियां की सबसे सौभाग्यशाली दुल्हन लग रही थी। उनकी
शादी को दो साल हो चुके थे। मगर जीजाजी उसे अपनी आंँखों से एक पल के लिए भी
दूर नहीं करते थे, सबसे मिल मिलाकर साथ ही वापिस ले जाते।
मीना की पढ़ाई अब खत्म हो चुकी थी। उसने मांँ से कह दिया था कि उसे भी जीजाजी
जैसा ही दूल्हा चाहिए। अब यह कोई वस्तु तो थी नहीं, मांँ बाज़ार से खरीदकर ला
देती। जो रिश्ता आता उसे उनके सामने तुच्छ लगता। समीर कालेज से ही उसे पसंद
करता था और उससे शादी करना चाहता था। मगर वह उसे टरकाती जा रही थी। वह उनके
जितना अमीर जो नहीं था।
आज जब समीर मीना से मिलने घर आया तो दीदी की अनुभवी आंँखों से मीना के प्रति
उसका प्रेम छिप ना सका और ना ही मीना का रूखापन। वह तो अभी भी किसी अमीर
शहजादे की तलाश में थी, जो बड़ी सी गाड़ी में उसे ब्याहने आएगा। अब छब्बीसवें
वर्ष की दहलीज पर थी। मांँ बाप की चिंता उसकी उम्र की तरह बढ़ने लगी थी।
समीर घर में सबको पसंद था। मांँ ने मीना को मनाने की जिम्मेदारी दीदी को सौंप
दी। उसके जाते ही दीदी मीना को अकेले कमरे में ले आई और समझाते हुए बोली, "जब
वह इतना प्यार करता है तुझसे, तो हांँ क्यों नहीं कर देती।"
"दीदी सिर्फ़ प्यार के सहारे जिंदगी नहीं कटती" कहते-कहते वह दीदी की सोने की
चूड़ियों और कंगनों की चमक में खो सी गई और अचानक पूछ बैठी, "क्या वह यह सब दे
पाएगा मुझे?"
दीदी कांँपती आवाज़ में बोली, "जो ऊपर से दिखता है वह होता नही है। कहते-कहते
अचानक दीदी ने चूड़ियां और कंगन ऊपर कर दिए। कलाई पर सिगरेट से जले निशान उनकी
साफ़ चुगली कर रहे थे।
"उफ़.. उसकी फटी फटी आंँखों से अविश्वास के अश्रु भरभराकर बह चले।
सीमा वर्मा
