कला, साहित्य को अपनी आजीविका का साधन नहीं बनाया जा सकता है। इसकी पैरवी करती मृणाल आशुतोष की लघुकथा पढ़िए :-
दंश
दरभंगिया जी अपने इलाके की कवि गोष्ठियों की जान समझे जाते थे।
उनकी अनुपस्थिति में गोष्ठी बिन गुलाब की फुलवारी-सी महसूस होती थी।
आज भी वह एक गोष्ठी में सादर आमंत्रित थे।
गोष्ठी परवान चढ़ रही थी पर सबकी आँखें उनको ही ढूँढ रही थीं। नज़रें दरवाजे पर से हटने का नाम नहीं ले रही थीं। उनके आगमन के साथ ही श्रोताओं में हर्ष की एक लहर-सी दौड़ गयी।
उन्होंने अपना कवित्त-पाठ आरंभ किया। पर आज वह श्रोताओं की अपेक्षा पर खरे
नहीं उतर रहे थे।
दूसरी कविता से निराश श्रोताओं ने उनकी हूटिंग शुरू कर दी।
नम आँखों और उदास चेहरे के साथ उनका पाठ अनवरत जारी था।
अब उनके एक प्रशंसक से रहा नहीं गया। उसने प्रश्न उछाला,"क्या कविवर, पाठ करना भूल गए क्या?
अब आप में वह धार रही नहीं। क्यों श्रोताओं का खून जला रहे हैं!"
अनेक लोगों ने उसका साथ दिया और हो-हल्ला शुरू हो गया।
"भाई, जब जेब खाली हो न तो कला-साहित्य भी साथ छोड़ने लगते हैं।"
प्रशंसक का हाथ पकड़कर बिठाते हुए एक श्रोता ने भरे स्वर में कहा।
मृणाल आशुतोष
मृणाल आशुतोष
द्वारा- श्री तृप्ति नारायण झा(शिक्षक)
ग्राम+पोस्ट- एरौत
भाया-रोसड़ा
जिला-समस्तीपुर (बिहार)
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