अर्चना राय
लघुकथा
हक
हरिया की देह पिछले छह घंटे से कोठरी में पड़ी थी। उसके नाते-गोतेदारों सहित शहर में बसे बड़ा और छोटा बेटा भी परिवार सहित आ चुके थे।
आँगन में जमा लोग मैयत की तैयारी करने की बजाए, असमंजस की स्थिति में बैठे थे। वजह थी हरिया की वसीयत रूपी चिट्ठी। सरपंच, पंडित और प्रधान आपस में उस चिट्ठी को लेकर विचार-विमर्श में व्यस्त थे। उनके चेहरे पर आने-जाने वाले भावों को सभी एक टक देखते हुए फैसले के इंतजार में थे।
थोड़ी देर बाद सरपंच जी ने बोलना शुरू किया, "हरिया की चिट्ठी के मुताबिक, उसकी सारी संपत्ति का हकदार, मनकू होएगा। वह चाहे तो अपने दोनों भाइयों को अपनी इच्छा से कछू दे सकता है, पर बाध्य न होगा। पर उसकी दूसरी इच्छा रही कि उसकी चिता को आग मनकू देगा। इसका क्या करें?"
"वैसे तो हरिया, हमारे धर्म और समाज के रीति-रिवाजों को अच्छी तरह से जानता था, फिर उसने ये…" ....... पंडित जी ने बात अधूरी छोड दी और अफसोस जताते हुए सिर हिलाने लगे।
फिर बोले, "अरे! माना कि उसके बड़े और छोटे दोनों बेटों ने अपने पिता के प्रति कोई जिम्मेदारी न निभाई। मझले बेटे मनकू ने ही सेवा की। इसलिये हो सकता है, प्रेमभाव वश उसे ये हक दे बैठा हो। पर हमारे धर्म के अनुसार ये ठीक ना है।”
"इसलिए हम सब ने फैसला किया है कि मनकू चाहे तो संपत्ति में से अपने भाइयों को कछू दे या न दे, पर पिता की चिता को आग देने का हक तो बड़े बेटे का ही बनता है, इसलिए....।
" सरपंच जी अपनी बात पूरी कर भी न पाए थे कि मनकू बीच में ही बोल पड़ा;
"ना, ना, सरपंच जी, ये फैसला मन्ने मंजूर ना है। आप चाहे तो संपत्ति में से मेरे दोनों भाईयों नै भी हिस्सा दे दो, पर बापू की चिता को तो आग में ही दूँगा।"
"पगलाय गया है क्या मनकू? तू ये क्या कह रहा है! बडे भाई के यहाँ होते हुए तू ये कैसे कर सकता है।"
सरपंच ने उसे घुड़की दी। "शास्त्रों में भी बडे बेटे द्वारा मुखाग्नि देने का विधान है, मंझले बेटे का ना है।"
प्रधान जी ने बीच में टोकते हुए कहा।
"सरपंच जी और पंडित जी, शास्त्रों में यह नहीं लिखा कि मंझले बेटे की माँ-बाप की सेवा की जिम्मेदारी है?…
जिसने अपनी जिम्मेदारी ही ना निभाई उसका कैसा हक… और सबसे बड़ी बात मेरे लिए तो बस बापू की इच्छा ही ईश्वर की बानी है। बापू को आग तो मैं ही देऊँगा।"
इतना कह मनकू पिता की अंतिम यात्रा की तैयारी में जुट गया।
अर्चना राय
लघुकथा
हक
हरिया की देह पिछले छह घंटे से कोठरी में पड़ी थी। उसके नाते-गोतेदारों सहित शहर में बसे बड़ा और छोटा बेटा भी परिवार सहित आ चुके थे।
आँगन में जमा लोग मैयत की तैयारी करने की बजाए, असमंजस की स्थिति में बैठे थे। वजह थी हरिया की वसीयत रूपी चिट्ठी। सरपंच, पंडित और प्रधान आपस में उस चिट्ठी को लेकर विचार-विमर्श में व्यस्त थे। उनके चेहरे पर आने-जाने वाले भावों को सभी एक टक देखते हुए फैसले के इंतजार में थे।
थोड़ी देर बाद सरपंच जी ने बोलना शुरू किया, "हरिया की चिट्ठी के मुताबिक, उसकी सारी संपत्ति का हकदार, मनकू होएगा। वह चाहे तो अपने दोनों भाइयों को अपनी इच्छा से कछू दे सकता है, पर बाध्य न होगा। पर उसकी दूसरी इच्छा रही कि उसकी चिता को आग मनकू देगा। इसका क्या करें?"
"वैसे तो हरिया, हमारे धर्म और समाज के रीति-रिवाजों को अच्छी तरह से जानता था, फिर उसने ये…" ....... पंडित जी ने बात अधूरी छोड दी और अफसोस जताते हुए सिर हिलाने लगे।
फिर बोले, "अरे! माना कि उसके बड़े और छोटे दोनों बेटों ने अपने पिता के प्रति कोई जिम्मेदारी न निभाई। मझले बेटे मनकू ने ही सेवा की। इसलिये हो सकता है, प्रेमभाव वश उसे ये हक दे बैठा हो। पर हमारे धर्म के अनुसार ये ठीक ना है।”
"इसलिए हम सब ने फैसला किया है कि मनकू चाहे तो संपत्ति में से अपने भाइयों को कछू दे या न दे, पर पिता की चिता को आग देने का हक तो बड़े बेटे का ही बनता है, इसलिए....।
" सरपंच जी अपनी बात पूरी कर भी न पाए थे कि मनकू बीच में ही बोल पड़ा;
"ना, ना, सरपंच जी, ये फैसला मन्ने मंजूर ना है। आप चाहे तो संपत्ति में से मेरे दोनों भाईयों नै भी हिस्सा दे दो, पर बापू की चिता को तो आग में ही दूँगा।"
"पगलाय गया है क्या मनकू? तू ये क्या कह रहा है! बडे भाई के यहाँ होते हुए तू ये कैसे कर सकता है।"
सरपंच ने उसे घुड़की दी। "शास्त्रों में भी बडे बेटे द्वारा मुखाग्नि देने का विधान है, मंझले बेटे का ना है।"
प्रधान जी ने बीच में टोकते हुए कहा।
"सरपंच जी और पंडित जी, शास्त्रों में यह नहीं लिखा कि मंझले बेटे की माँ-बाप की सेवा की जिम्मेदारी है?…
जिसने अपनी जिम्मेदारी ही ना निभाई उसका कैसा हक… और सबसे बड़ी बात मेरे लिए तो बस बापू की इच्छा ही ईश्वर की बानी है। बापू को आग तो मैं ही देऊँगा।"
इतना कह मनकू पिता की अंतिम यात्रा की तैयारी में जुट गया।
अर्चना राय
पिता ने महात्वाकांक्षा के चलते कठोर अनुशासन में अपनी बेटी का पालन किया। बेटी ने पिता के विश्वास की डोर टूटते हुए देखा, तो उसके हृदय में सैलाब फुट पड़ा। पढ़िए अर्चना राय की लघुकथा सैलाब :-
लघुकथा
सैलाब
पड़ोसी के घर सुबह से ही बधाई देने वालों का ताँता लगा देख, वे गुस्से से भर बेटी पर फट पड़े,
"देखो तुम्हारी सहेली स्वाति ने आई.आई.टी. में टॉप किया है। और तुम?"
बेटी ने एक गहरी नजर पिता पर डाली और बिना कुछ कहे अपने काम में व्यस्त हो गई।
"प्रतिमा … देखो तुम्हारी बेटी कितनी ढीठ हो गई है। बजाय अफसोस जताने के मुझे आँखें दिखा रही है।"
रसोईघर में काम कर रही पत्नी से उन्होंने कहा।
"नहीं जी, हमारी बेटी ऐसी नहीं है, आपको गलतफ़हमी हुई लगती है।”
“इसकी सहेली स्वाति ने आई.आई.टी. में टॉप किया है और ये निकम्मी और ढीठ!”
“ऐसा न कहो जी, हमारी बेटी भी बड़ी होनहार है।"
"अच्छा होनहार है? तो फिर इसका सिलेक्शन क्यों नहीं हुआ?"
"आप जानते ही हैं कि हमारी बेटी स्कूल में हमेशा फस्ट आई। अब न जाने क्यों पिछड़ रही है? समझ में नहीं आता, क्या हो गया।"
"क्यों न पिछड़ेगी, दिनभर मोबाइल में जो घुसी रहती है।”
"मोबाइल में तो जानकारियाँ ही ढूँढती है जी।”
“नजर रखा करो इसपर, कहीं किसी गलत चक्कर में न पड जाए।"
“हाँ...हाँ…नजर रखती हूँ जी।"
"अभी तो इसने सिर्फ नजरें नीची कराई हैं, कहीं ऐसा न हो कि आगे हमारी नाक ही कटवा दे।"
“नहीं जी, ऐसी नहीं है हमारी बेटी। बहुत समझदार है वह।”
"दिन-रात गधे की तरह खटा हूँ इसके लिए? क्या यही दिन देखने के लिए शहर के सबसे बड़े कॉलेज में एडमिशन कराया, पढ़ने के लिए भी पूरी सुविधाएँ दी।"
बेटी के कुछ न बोलने पर वे गुस्से से उबल पड़े,।" आखिर वर्मा ने अपनी बेटी के लिए ऐसा क्या
किया जो मैंने नहीं किया?"
अब तक चुप बैठी बेटी आखिर बोल ही पड़ी, "दुनिया के सामने अपनी नाक ऊँची रखने
के लिए ही किया यह सब आपने। लेकिन मुझे जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, वो कभी
नहीं किया।"
"क्या, नहीं किया?"
"विश्वास!" कहते हुए गुस्से से उसकी आँखों में लाल डोरे खिंच गए, जो पल भर बाद स्याह हो गए और वहाँ सैलाब आ गया।
“विश्वास करते और पढ़ने व कोचिंग के लिए घर
से बाहर जाने देते तो आज आपको भी बधाई दे रहे होते लोग…।”
अर्चना राय
