मंगलवार, 21 जुलाई 2020

साहित्यकारों से मिलिए : मनोरमा पंत की लघुकथाएं

मनोरमा पंत

लघुकथा


माँ ,मेरी सखी ,सहेली


पापा!" आज कवि गोष्ठी  में   मम्मी को भी साथ ले जाना ।"

क्यों ?क्या करेगी वह वहाँ जाकर ,क्या समझ है उसे कविताओं की ?और फिर मेरी कविताऐं  तोे  बड़ी  गूढ़  अर्थ वाली होती हैं , समझी ?"
"आपको कैसे मालूम  कि उन्हें कविताओं की समझ नहीं है ?,कभी पूछा आपने?
नहीं पूछा कभी जरूरत ही नहीं  समझी।अब तो तुम बड़ी हो गई हो ,तुमने पूछा ?
हाँ पापा ,पूछा मैंने ।"जब   मैं नन्हीं सी थी , तब से ही मैं उनकी मधुमयी अँगुलियों के स्पर्श से बड़ी सुरक्षा महसूस करती रही हूँ।उन्होंने  मेरा आत्मविश्वास  कभी खंडित नहीं होने दिया ।आज उनकी सखी बनकर यही काममैं उनके  लिये कर रही हूँ ।मैंने उनके अंतर्मन में झाँकर वह सब पढ़ लिया जो आप नहीं पढ़ सके, कहते हुऐ नीना ने ताजे अखबार का मुखपृष्ठ अपने पापा के सामने रख दिया जिसमें उसकी माँ  की तस्वीर  सहित खबर छपी थी -"श्रीमती सीमा शर्माभोपाल , राष्ट्रीय  कविता प्रतियोगिता में प्रथम आई है "।

मनोरमा पंत 
मोबाइल 9229113195 

शनिचरी  
अरे! कलजुग आ गया ,सुना तुमने ,रामू मेहतर के साथ शनिचरी भाग गई ,।।दूसरी औरत बोली -राम ,राम !बामनी होकर मेहतर के साथ !छिः! पूरी बिरादरी का नाम खराब कर दिया ।बड़ी सती सावित्री  कहते थे ,सब लोग ।तीसरी कहाँ चुप बैठने वाली थी,मजे लेकर बोलने लगी -रोज पति शराब पीटता था ,पर खाने पीने ,ओढने को तो देता था,कुलटा कहीं की ,।टोले की सभी औरते शनिचरी की एकसुर में निंदा कर रही थी कि सामने से रामू आता दिखा ।सब आवाक रह गई,।
पास आते ही सबने एक स्वर में पूछा -क्यों रे!शनिचरी को कहाँ  छोड़ आया ?रामू ने आश्चर्य  से पूछा -कौन शनिचरी ?  
ज्यादा  भोला न बन ,दोनों भागे थे ना? -एक दबंग औरत ने कहा ।
रामू ने  रूआँसे स्वर में कैफियत दी -मैं तो अपनी बिमार माँ को देखने गाँव गया था ।चाहे तो पता कर लो ।
"बताकर क्यों नहीं गया ? " समवेत स्वर सुनाई दिया ,।"
पर मैं तो कभी भी बताकर नहीं जाता ? हमेशा ही तो गाँव चला जाता हूँ ।कोस भर की दूरी पर ही तो है ।- रामू बोला "।
सत्य जानकर सब औरते अनमनी हो गई ।पर शनिचरी जाते जाते प्रश्न छोड़ गई ,रामू के साथ नहीं तो किसके साथ भागी वह? यदि किसी के साथ  नहीं गई तो क्यों भागी?  किसी को भी जानवरों  के समान पीटती अनाथ शनिचरी के गहराते दागों की याद नहीं आई ।
लघुकथा 

भटकाव 

कोरोना ने सुरेश की जिंदगी के पहिए  थाम दिऐ। बड़ी मुश्किल से उसे अपनी मन पसंद नौकरी मिली थी ,वह भी चली गई ।निराशा के गर्त में डूब कर वह गहरे अवसाद  में चला गया ।अपने युवा पोते की यह दशा देखकर उसके दादा जी रात को उसकी मेज पर विवेकानंद जी  की एक पुस्तक  रखकर चुपचाप  चले गऐ ।सुरेश ने अनमने मन से उस पुस्तक  के पृष्ठ  पलटे और उसके की निगाह एक पेज पर थम गई जिसमें युवाओ के भटकाके बारे में विवेकानन्द  जी ने लिखा  -"आत्मबल ,कौशल ,ध्येय और आत्मविश्वास युवाओ को भटकाव से बचाते हैं ।आत्मबल सबसे जरूरी हैयदि आप स्वयं को कमजोर समझते हैं तो कमजोर बनेगे ,शक्तिशाली  समझेगा तो शक्तिशाली  बनेगे ।आत्मसम्मान से जीवन कीकोई दिशा तय कर सकेगे , शिक्षित होने के साथ किसी कौशल में पारंगत होना जरूरी है और अंत में आत्मविश्वास  से दुर्गम से दुर्गम कार्य भी सहजता से कर सकते हैं।"बस विवेकानंद  की इन बातों कोपढते ही सुरेश में एक नई ऊर्जा का संचार हो गया उसने सोचा एक रास्ता बंद हो गया तो क्या दूसरे तो खुले हैं ,नौकरी गई तो क्या हुआ ,दूसरे अवसर तलाशेगा और अवसाद की गंदी चादर फेक नई सुहानी सुबह के इंतजार मेंशांत होकर सो गया। 

लघुकथा 
कटी पतंग

अभी नीरज को गुजरे महिना भी नहीं गुजरा था ,कि सुकन्या के लिऐ उसके पिता के पास रिश्ते आने शुरु हो गये इतने तो तब भी नहीं आऐ थे जब वह कुँवारी थी ।उसके पिता असमंजस  में पड़ गये कि बेटी से क्या कहे ,क्या पूछे । हर समय वहआँसू पौंछती रहती है ।समझ नहीं पा रही थी वहकि पहाड़ सी जिन्दगी अकेले कैसे बीतेगी ।आज मकर संक्रांति  पर उसकी निगाह आसमान  पर गई ,रंग बिरंगी सुदंर पतंगों से सजा हुआ था ,उसकी निगाहें एक लाल रंग की पतंग पर अटक गई जो आसमान में  सबसे ऊपर बल खाती लहराती ,नाचती सी ऊपर और ऊपर बढती जा रही थी ,मानों क्षितिज को छूने की होड़ में है ,अचानक एक काली पतंग उपर उठती गई और अंत में उसने लाल पतंग को काट दिया ,लाल पतंग तेजी से नीचे गिरती गई औरनीचे उसे लूटने 
की होड़ लगी गई ।उसे लगा कि वह भी  लाल पतंग के समान शीर्ष पर जाकर कट गई है ,और उसकी बैंक मैनेजर की नौकरी के कारण लूटने वालों का मजमा लगा है ,उसने उसी समय दृढ निश्चय  कर लिया कि वह कटी पतंग नहीं बनेगी ।



मनोरमा पंत
सेवानिवृत  शिक्षिका केन्द्रीय  विद्यालय 

सम्प्रति- सदस्या  विश्व  मैत्री मंच
             लेखिका  संघ  भोपाल 

साहित्यिक  परिचय :  

जागरण, कर्मवीर एवं अक्षरा में कविताएं तथा लघुकथाएं प्रकाशित 

आन लाइन प्रकाशन  : 

हिंदी रक्षक मंच इन्दौर  पर लेख कविताऐं लघुकथा 

आनलाइन रचना पाठ :  

लेखिका  संघ भोपाल 
माधव साहित्य  संगम 
 बाड़मेर राजस्थान 

निवास : भोपाल मध्यप्रदेश 

दूरभाष  0755   4274447 

मोबाइल 9229113195 

पिन कोड  462016


पढ़िए मनोरमा  पंत की न्याय व्यवस्था पर व्यंग्यात्मक लघुकथा 
न्याय का हाथी 


       सुबह से ही शहर में बड़ा शोर था ।  मालूम पड़ा आज पूरे शहर में न्याय का हाथी घूमेगा और हाथों हाथ न्याय हो जावेगा। 
सभी बड़े उत्साहित  थे । यह खबर गरीबों की बस्ती तक पहुँची । 
वहाँ के लोगों ने राहत  की साँस ली और कहा  -" भगवान  के यहाँ देर है पर अँधेरे नहीं"। सभी  अपनी अपनी समस्याओं की अर्जी बनाने में जुट गये । कड़ाके की सर्दी में भी सभी गर्मी महसूस कर रहे थे । आखिरकार  इंतजार  की घड़ियाँ समाप्त हुई और शोर मचा कि न्याय का हाथी बस इधर आने ही वाला है । गली में सन्नाटा  पसर गया , सभी दम साधे अदब से खड़े हो गये । पर न्याय का हाथी तो गली में आया ही नहीं । 

चारे की सुगंध  से वह अमीरों  की बस्ती की ओर मुड़ गया था। 


लघुकथा