शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

लघुकथा : अनजाना पाप




लघुकथा 

अनजाना पाप 

जेठ की तपती दोपहरिया ! धीमी - धीमी होती सांसे, विलुप्त हो गई ! ज़र- ज़र काया को छोड़ कर उसकी आत्मा अपने परमेश्वर से मिलने उड़ गई ! 

मेहमानों का जमावड़ा होने लगा था! पैतृक निवास में नल की पाइप लाइन भी सड़-गल गई थी! 
 ठेकेदार को नई पाइप लाइन डालने का काम सौप दिया गया था ! 

अब नई पाइप लाइन डल गई थी! नल से शुद्ध जल की धारा बहने लगी थी! परिवार के सदस्य स्वच्छ जल पा कर मन ही मन खुश थे! 

सतीश कुमार जी ने माता की पेंशन की जमा राशि से ठेकेदार को दस हजार रुपयों का भुगतान कर दिया था! 


 उदय श्री. ताम्हणे 
 
पता 

शिवाजी नगर भोपाळ