शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

लघुकथा : कालु का कर्म

 लघुकथा 
अवसर 

         सुबह के ठीक १०:३० बजे है ! जेठ की गर्म हवा चल रही है ! कार्यालय के दरवाजे के सामने अपाहिज कालू गर्म फर्शी पर ही अपनी गुदड़ी बिछा कर बैठ गया है ! पसीने की बुँदे कनपटी पर छलक रही है ! 
अब १२ बजे तक कालू वहीँ बैठेगा ! दरवाजे से १ फर्लांग की दुरी पर ही घने वृक्षों की छाया है ! किन्तु कालू अभी इसका लाभ नहीं लेगा ! क्योकि उसे अपनी दाल रोटी की चिंता जो है ! वह सुअवसर का लाभ उठाना जानता है ! 

११ बजे कार्यालय मे आने जाने वालो का ताँता लग जाता है ! जिनमे से कुछ लोग उसकी गुदड़ी पर सिक्के छोड़ ही जाते है ! 

* उदय श्री. ताम्हणे, भोपाल 

शिवाजी नगर भोपाळ 
मोबाइल 9200184289


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