शनिवार, 15 अगस्त 2020

लघुकथा : संतोष

लघुकथा 

संतोष 

उदय श्री . ताम्हणे 

          रात्रि में घडी ने आठ घंटे बजाये ! 
बद्री प्रसाद जी ,डाइनिंग टेबल के करीब रखी कुर्सी पर विराजमान हो गए ! 
बहु सुनीति ने भोजन की थाली परोस दी ! 
बद्री प्रसाद जी ने रोटी का कोर सब्जी में डुबोया , अब मुँह में डालने ही वाले थे की सहसा रुक गए ! 
बद्री प्रसाद जी को बचपन से आदत है , वे भोजन की थाली में मीठा लेकर ही भोजन करते है ! 
 " बहु ! आज थाली में मीठा रखना भूल गई ? " 
" बाबूजी ! अब आठ हजार रूपये पेंशन से , थाली में रोज गुलाब जामुन रखना सम्भव नहीं है ! "
" क्यों भला ? मुझे तो अठ्ठाइस हजार रूपये पेंशन मिलती है ! " 
तभी कार की रोशनी से मकान जगमगा उठा ! कार की हेड लाईट भोजन की थाली पर पड़ी ,प्रकाश परावर्तित हो कर बद्री प्रसाद जी के चेहरे पर आया ! 
पल भर के लिए उनकी आँखे रोशनी से चुंधिया गई ! 
अब गाड़ी की लाईट बंद कर दी गई थी ! 
ठक . ठक .ठक . ठक . पद चाप सुनाई दे रही थी ! 
संतोष कमरे में दाखिल हुआ !
सुनीति कमर पर हाथ रखे खडी थी !
संतोष सारा मामला समझ गया ! 
" आप आ गए ! अब आप ही समझा दीजिये , बाबूजी को ! " 
" बाबूजी ! मैंने आपको बताया तो था , हमने जो नई कार खरीदी है ! उसकी इजी मंथली इंस्टालमेंट इस माह से आपके पेंशन अकाउंट से कटना है ! सो बीस हजार रुपये कट गए है ! " 
बद्री प्रसाद जी ने चीनी के डब्बे मे से चुटकी भर शक़्क़र निकालकर अपनी थाली में रखी ! 
सब्जी में भीगा हुआ रोटी का निवाला मुँह में रखकर वे चबाने लगे !