प्रेम का धागा भी ऊर्जा का स्त्रोत है।
इसे लघुकथा में चित्रित कर बबिता कंसल ने हमें भेजा है।
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"इस बार की राखी "
"मां राखी लेनें कब चलेगें "?
"भाई के लिए बहुत सुन्दर,कीमती राखी ही मैं खरीदूंगी .....! बाजार में कितनी
सुन्दर राखी मिलती है ।आप ही ले आती है हर वर्ष! पर इस बार मैं अपनी पसन्द से
ही लूगी "।
" देखो रमा कोरोना महामारी के चलतें बाजार ज्यादा खुल नहीं रहे हैं । बाहर
जाना स्वास्थय की दृष्टि से भी खतरें से खाली नहीं है। हमारा चायना में बनी
राखी ना खरीदना भी देश हित में होगा" ।
"मां तो क्या राखी का त्यौहार नहीं मनायेंगे। बिना राखी, मैं भाई को राखी
कैसे बांधूंगी" .....।
"रमा तुम राखी अपनें भाई के जरुर बांधोंगी "!
"पर मां कैसे...." ?
"बेटी बाजार में बिकनें वाली कीमती राखी ही नहीं होती है ।राखी हम घर पर
भी मन सकतें हैं।
उस के लिए हमें जरुरत होगी कुछ सामान की जो घर में ही मिल जायेगें।फूल ,पत्ते
,मोली ,कढ़ाई करनें वाले रेशमी धागें ,गोटा ,मोती ,हल्दी की गांठ ,
चुड़ी पर रेशम लपेट कर ,रेशमी कपड़ों से फूल बना कर राखी बना सकते हैं "।
"अरे वाह मां ये तो बहुत अच्छा तरीका सुझाया आपनें.....
मैं भी राखी बनाना सीखूंगी, और भाई के अपनें हाथों से बनी राखी ही बांधूंगी "।
"रमा भाई ,बहन का प्रेम अटूट और पवित्र होता है ।वह किसी कीमती चीज का
मोहताज नहीं होता है ।
जब प्रेम से अपनें हाथों से बनी राखी भाई के बांधोंगी तो वह अनुपम उपहार से
कम नहीं होंगा ,
प्रेम से बांधी मोली का धागा भी
भाई बहन के प्यार में नयी उर्जा भर देगा "।
नाम -बबिता कंसल
माता - प्रतिभा रानी
पिता -धर्मेंद्र मोहन गुप्ता
जन्म स्थान - जानसठ (मुजफ्फर नगर )
शिक्षा एस .डी .डिग्री .मु०नगर
शिक्षा M.A -इक्नोमिकस,इतिहास
प्रकाशित रचनाए -भोपाल लोकजंग , साझा काव्य संग्रह महिला विशेष अन्तरा शब्द
शक्ति , अन्तरा शब्द शक्ति होली रंगारंग काव्य साझा संग्रह
वर्तमान अंकुर ,हिन्दी मैट्रो ,पत्रिका स्पंन्दन ,जय विजय पत्रिका और अनेक
ईपुस्तको मे प्रकाशित।
पता है
बबिता कंसल
7011043322
Babita consul
Pankaj Consul, S-469/10,
4th floor, School Block, Shakarpur, Delhi-110092.
