लघुकथा
हाँ! तुम बिल्कुल वैसी हो ............
कुछ दिन पहले की बात है।
रिया ने कहा था "शाम को तो मुझे आने में देर होगी।"
मैं समझ गया, कुछ न बोला।
हुआ भी वहीं शाम को रिया बेटी का इंतजार करते - करते मुझे नींद आ गई।
जब रात एक बजे नींद खुली तो जी बहुत घबरा रहा था। दिवार घुमती हुई सी प्रतीत हुई।
मानसिक तनाव जोर पकड़ रहा था।
बेटी गहरी नींद में थीं। उसे उठाना मुझे मुनासिब नहीं लग रहा था। डियूटी की घण्टों की थकान लग रही थी। अब क्या करु।
मैं चुपके से बिस्तर से उठा और फिर धीरे से उसका पर्स खोलकर देखा।
अब मैं पूर्णरूपेण आश्वस्त था। तनाव रहित।
उसके पर्स में मुझे पूरा बी. पी. की गोलियों का नया पत्ता मिल गया था।
*उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश
लघुकथा का सौदर्य
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मेरी लघुकथा ;
मेरा विश्लेषण ।
लघुकथा
हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो *****
1 लघुकथा का शीर्षक पाठक को लघुकथा पढ़ने के लिए आकर्षित करेगा। जैसे कोई प्रेम कथा हो।
2 शुरुआत की पंक्तियों में बेटी न लिखकर पाठक को आभासित किया कि रिया मुख्य पात्र की पत्नी या प्रेमिका है।
एक पेंच का रूप दिया।
3 मुख्य पात्र की बेटी हैं रिया और उनके मानसिक तनाव का संकेत दिया है।
4 मुख्य पात्र की पत्नी व अन्य सन्तान का ज़िक्र नहीं किया पाठक पर छोड़ दिया है।
5 पर्स खोल कर देखा और आश्वस्त हुआ तनाव रहित से तात्पर्य रहा कि बेटी समझदार हैं।
मैं लघुकथा के विश्लेषण में कितना सफल रहा यह तो पाठक समीक्षक विज्ञजन ही बताएँगे।
सादर।
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश
