बुधवार, 26 अगस्त 2020

पापा बन जाना और स्वागतम् लघुकथाकार मनोरमा पंत


मनोरमा पंत 
लघुकथा 
पापा बन जाना 
      पापा ! आपको हो क्या गया है, देखिये, शर्ट आधी पेन्ट के अन्दर है, आधी बाहर और बालों में कंघी क्यों नहीं की?
     एक क्षण मुझे लगा बेटे तुषार के स्थान पर मैं खड़ा हूँ और मेरे स्थान पर मेरे पापा। मैं अपने पापा को आगाह कर रहा हूँ कि  शर्ट ठीक ढ़ग से खोसी नहीं गई है ।
मैंने सोचा कि कैसे अनजाने में धीरे धीरे पापा बनता जा रहा हूँ। लोगों को प्रभावित  करने वाली बोली धीमी पड़ गई ।पापा के समान टोका टोकी की आदत बदल गई ।ढेरों कपड़े अभी भी हैं पर चार  कपड़ों से ही काम चला रहा हूँ।
पुनः  अपनी सोच से बाहर  आकर अपनी शर्ट  पूरी तरह पेन्ट  में डाल ,बालों में कंघी करके
सब्जी का थैला कंधे पर डाल पापा के समान  धीरे धीरे चलता हुआ बाहर निकल गया ।रास्ते में निश्चय  कर लिया कि मुझे अपने पापा का डुप्लीकेट  नहीं बनना है ,नये सिरे से उत्साहित  होकर ऊर्जावान  बन नई जिन्दगी  की शुरूवात  करना ही होगा । 

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मनोरमा पंत  
 लघुकथा  

स्वागतम  
             जब मार्केट, पोती के कर्ण छेदन हेतु रामेश्वर के पास गई, जो एक ज्वेलर की दूकान के बाहर बैठता है ।छोटा मोटा काम करके पेट भरता है ,आते जाते पहचानने लगे एक दूसरे को।तो उसने हँसकर स्वागत  किया ।मैंने भी मुस्कुरा कर पूछा - लाकडाउन के बाद में सबके चेहरे पर मायूसी दिखी ,पर तुम?हँसते हँसते बोला - हम गाँव के लोग हैं ,समस्याओ से जूझते हीरहते हैं ,नदी किनारे घर है ,बाढ का डर बना रहता ,पर घर छोड़कर नहीं  जाते ।बीबी जी!समस्याओ  से कैसे निपटा जाऐं यह 
हम जैसे लोग अच्छी  तरह जानते हैं।
मैं पूछा -लाकडाउन  में कैसा अनुभव  रहा ?
उसने उत्तर दिया -बेटा भोपाल में नौकरी करता था छूट गई ।हम दोनों गाँव आ गऐ l अचानक आए संकट से घबराए जरूर पर टूटे नहीं । घर के पीछे सब्जियाँ  उगाई और बेची ।।हाँ एक बात बताना भूल गया ।कोरोना सकंट में मेरे बेटे ने अपना पुश्तैनी धंधा सीख लिया ,उसे समझ में आ गया कि नौकरी के साथ एक कौशल का काम आकस्मिक  आपदा में काम आता है ।
    एक छोटे से धंधे में लगे परिवार ने जिन्दगी का पाठ पढा दिया कि समस्याओ  से डरे नहीं , पहला हम उन्हें हल करने की क्षमताओं की खोज करते हैं । दूसरा हमें उनसे भविष्य  में बचने काअनुभव प्राप्त होता है ।

मनोरमा पंत

और गौरया जीत गई

बहुत दिनों से मेरे और गौरया के बीच झगड़ा चल रहा है। 


     झगड़े की जड़ है उसका घोसला। वह मेरे शयनागार  में टँगी तस्वीर  के ऊपर घोसला बनाना चाहती है, जो मुझे कतई पसंद नहीं,पर वह मान नहीं रही है। जरा सी खिड़की  खुली नहीं कि मुहँ में तिनका दबाए वह अंदर। 

 मैंने उससे कहा- 
"यहाँ घोसला मत बनाओ। 

वह बोली -" क्यों न बनाऊँ। 

      तुम्ही लोगों ने वापिस बुलाया। पहले तो सबने मुझे भगा दिया। जंगल काट दिये, झाड़ियाँ  तक साफ कर दी । छोटे मोटे पोखर, तालाब
पूर दिये। नम भूमि भी नहीं छोड़ी। उस पर खेती करने लगे। तो मैं क्या करती खूब
दूर चली गई।" 

मैंने कहा -" हाँ गलती तो हुई   है। " 

    "फिर गौरया दिवस मनाने लगे। कविताऐं लिखने लगे।  सकोरे में दाना पानी रखने लगे। अब आ गई हूँ, तो कह रही हो घोंसला मत बना।" 

मैंने समझाया -"बाहर झाड़ियों में बना ले"। 

 वह बोली - "बाहर  बिल्ली  कोरोना बनकर कर घात में बैठी रहती है। मेरे बच्चों
को खा जावेगी ।" 

     मैं सिर थामे बैठ गई। देख  लिया कि वह नहीं मानेगी।  मानेगी क्या आधा घोंसला बना ही चुकी है। 
 पँखे का अलग डर कि बच्चे उससे टकराकर मर न जाऐं। तो पंखा बंद ही रखना पड़ेगा। 

मैंने अब अपना शयनागार  बरामदे को ही बना लिया है। 

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