शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

लघुकथा : कर्मयोगी





कर्मयोगी 

वह सुबह सवेरे जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद अपनी "उम्मीदों" की दुकान खोल लेता है। 
उसकी दुकान में सामान्य जरुरत की सभी वस्तुओं का संग्रह रहता है। 
जिसको जो आवश्कता होती, वह लेता "दाम"  चुकाता और चल देता है। कोई तो खाते में "लिख लीजिए" कह कर चला जाता है। 

सहायक मुरारी तो कहता है, "लक्ष्मी का वास" है उसकी दुकान में। 

 दिन भर उसकी दुकान में राम राम जी की पुकार होती रहती है। 

वह छोटे कद का आदमी बहुत ही संतुलित बातचीत करता है। 

क्या बच्चे क्या बुजुर्ग और क्या महिलाएं सभी का‌ वह "रामु काका" है। 

‌लेकिन  आज सभी लोग "रामु काका" को देखकर 
पानी - पानी हुए जा रहे हैं। 
अब वहां पर तो "रामु काका" की तस्वीर ही  है। 

सहायक मुरारी ने आज़ पुरे 15 दिनों के बाद दुकान खोली है। 
उदय श्री ताम्हणे 
भोपाल मध्यप्रदेश