स्वर्णिम अवसर
दीनदयाल जी मित्र मंडली में मित्रों के साथ बैठे बातचीत में मशगूल थे। तभी उनकी नज़र मनोहर जी पर पड़ी वे चुपचाप गुमसुम बैठें थे।
दीनदयाल जी ने कहा "मनोहर जी आप क्या सोच रहे है?"
मनोहर जी बोले "सेवा निवृत्त होकर मैं अपने को असुरक्षित महसूस कर रहा हूं।"
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"बेटों का आपस में सामंजस्य नहीं है। पत्नी की स्वास्थ्य की समस्याओं से लाचार और पोतों
की शिक्षा की अव्यवस्था से निराश हूं।"
"अरे मनोहर जी! क्या ये समस्याएं आपने निर्मित की है। आप तो अपना कर्म कर ही रहें है न? फिर आप क्यो विचलित हैं?"
"आप सेवा निवृत्ति के पश्चात के स्वर्णिम दिनों को विषमय क्यो बना रहे है?"
मनोहर जी निरुत्तर हो गए। उन्होंने मित्र मण्डली की बातों में रुचि लेना शुरू कर दिया।
अब उनके चेहरे पर जीवन की दूसरी पारी की विजयी मुस्कान दिखाई दे रही है।
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश
