शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

लघुकथा : आत्मनिर्भरता का सुख

 लघुकथा 


 


आत्मनिर्भरता का सुख 


राम खिलावन जी सारा दिन नाती पोतों को खिलाते रहते थे। जान छिड़कते थे उनपर। 


मित्र मण्डली उन्हें आगाह किया करती थीं, 

"ये  बच्चे उच्च शिक्षा के लिए बाहर रहेंगे। फिर आप कैसे रहेंगे।" 


राम खिलावन जी हंस कर  टाल देते थे। 


बेटा बहू गदगद थे, उनको केयरटेकर की जरूरत कभी न पडी। 


राम खिलावन जी के चेहरे पर तृप्ति के भाव देखकर मित्र मण्डली भौचक्की रह गई थीं। 


 सुबह सुबह  उन्होंने 

"बेटा बहू के विदेश में स्थाई होने की घोषणा कर दी थी।"  


मित्र मण्डली जानती थी, राम खिलावन जी अपना पैतृक मकान तो छोड़ने से रहे। 

उदय श्री ताम्हने 

भोपाल मध्यप्रदेश 





उदय श्री ताम्हने 

भोपाल मध्यप्रदेश