शनिवार, 12 सितंबर 2020

गद्य क्षणिका : जैसा भी हूं

 







जैसा भी हूं ......! 


दो सप्ताह, चौदह दिन के असमंजस  का उथल पुथल भरा जीवन। 

उसे इतना सीखा गया था, जीतना 44 वर्ष में  भी वह  सीख नहीं पाया था। 

शक्ति पुंज चाहिए थे, भोजन का अभाव था। 

तिलमिला गया था वह। 

सैकड़ों सन्देश, ढाढस बांधने वाले, फोन कॉल हिदायत और आशीर्वाद के, मिल गए थे। 


ईशकृपा तो बरस रही थी। लेकिन वह अनजान सा ही रहा। 

अपनों से मिलने की उत्कंठ इच्छा चरम पर थी। 


कांटे चुभ रहे थे, मुंह कसैला हो गया था। 


मन ही मन बुदबुदा गया वह : "क्या मुक्ति ऐसी भी होती हैं।" 


 ह्रदय से आवाज़ निकलकर ज़ुबान पर आ  ही गई थी:

"जैसा भी हूं, अच्छा हूं।" 


उदय श्री ताम्हणे 

भोपाल मध्यप्रदेश