गुरुवार, 17 सितंबर 2020

लघुकथा: सच्चे मित्र

 






लघुकथा 


सच्चे मित्र 


कभी राजेन्द्र और सुरेंद्र घनिष्ठ मित्र हुए। 


कार्यालय में भोजन अवकाश होता तो दोनों साथ ही बैठते । यदि  राजेन्द्र थोड़ा पहले आते तो सुरेंद्र के टिफिन से कुछ न कुछ निकाल कर स्वाद ले लेते थे। 

 सुरेंद्र भी कभी पीछे नहीं रहते थे, वे पहले आ जाते तो टिफिन खोल कर बैठ जाते, और कहते 

 "वाह वाह ! आज भाभी जी ने क्या लज़ीज़ सब्ज़ी बनाईं है।" 


विधि ने कुछ ऐसा विधान रचा कि अब दोनों मित्र मेज़ के अलग अलग कोनों पर बैठते है। 

दिन भर मास्क लगाए रहते हैं। 


वार्तालाप तो होता है, लेकिन सिर्फ चुप्पी तोड़ने के लिए।  वे दोनों है तो अभी भी सच्चे मित्र ही। 


उदय श्री 

भोपाल मध्यप्रदेश 

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