रविवार, 20 सितंबर 2020

लघुकथा: हज़ार राहें मुड़कर देखी

 लघुकथा 

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हज़ार राहें मुड़कर देखी 

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 शिवानंद बहुत खुद्दार व्यक्तित्व का स्वामी है। 


नौकरी में रह कर भी उसने कभी किसी से "कुछ" नही लिया। 


                यहां तक कि उसके सहकर्मी, मित्र और  पड़ोसी भी कहते रहे 

"शिवानंद! बाबा आदम के जमाने की बातें करते रहते हो।" 


 "शिवानंद! अपने सिद्धांत पर अडिग रहा, वह बोल भी देता "तेल देखो, तेल की धार देखो।" 


रिश्तेदार तो हंसी उड़ाने से भी परहेज़ नहीं करते। 


अक्सर उसे अपने पिता के कहे अंतिम शब्द याद आते " शिवानंद! मैने  सरकारी कार्यालय में  खूब कार्य किया, लेकिन कभी किसी से डर कर न किया।" 


                बरसों हो गए हैं। आज भी शिवानंद  भोजन करता है, तो सबसे पहले थाली से "चमचे" निकाल कर बाहर रख दिया करता है। फिर इत्मीनान से भोजन करता है। 

उदय श्री ताम्हने 

भोपाल मध्यप्रदेश