रविवार, 27 सितंबर 2020

भावनाओं का सम्बल लघुकथाकार प्रेरणा गुप्ता

 वैश्विक महामारी के दौर में मानव अनेक आशंकाओं से घिरा हुआ है। शांतचित्त रहना मुश्किल हुआ जा रहा है। सकारात्मक विचारों  की धारा बहती रहने के लिए हमें दूसरों की खुशी में भी अपनी खुशी तलाशना चाहिए। दूसरों से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। 


लघुकथा 


भावनाओं का सम्बल 


            अचानक कमरे में अँधेरा-सा छा गया। अरुँधति ने खिड़की से बाहर झाँककर देखा।

आसमान में काले बादल घिर आए थे। वह तेजी से बालकनी की ओर चल दी। मुँडेर पर से कपड़े उठाते हुए उसकी निगाह कार्निस की ओर चली गयी। 

लगभग इक्कीस दिन हो चले थे और कबूतरी ज्यों की त्यों बैठी अपने अंडों को  सेक रही थी। थोड़ी ही दूर पर बैठा कबूतर उनकी रखवाली कर रहा था।

वह सोच में पड़ गयी। आखिर कब तक दोनों अपने अंडों की रक्षा कर पाएंगे! कल की ही तो बात है, जब नेवला अंडों को सूँघते हुए वहाँ आ पहुँचा था और आज अगर जोर की बारिश आ गयी तो!" 


 उसका जी घबरा उठा। 


सिया के भी तो नौ महीने पूरे हो चुके हैं, किसी भी वक्त उसे अस्पताल ले जाना पड़ सकता है। मगर महामारी के चलते तो आजकल अस्पताल ले जाना भी खतरे से खाली नहीं! 


आँखों के सामने अँधेरा-सा छाने लगा। 

तभी पंखों की फड़फड़ाहट पाकर उसकी चेतना जाग उठी। उसने चौंककर कार्निस की ओर देखा और आवाज देती अंदर कमरे की ओर दौड़ पड़ी। 


"सिया! देख तो सही, अंडा फूट गया है और उसमें बच्चा भी हिलता-डुलता दिखाई दे रहा है।"


"सच माँ!" सिया उसका हाथ थामकर कबूतर के नवजात शिशु को देखने चल दी। तब तक दूसरा अंडा भी फूट चुका था। 


          हर्षोल्लास से तालियां बजाती सिया खिलखिला उठी। 


              अरुंधति की आँखें छलक आईं। कब से यही उल्लास तो वह सिया के चेहरे पर देखना चाह रही थी। 

उसने कबूतर के बच्चों की बलैया ली, फिर सिया की बलैया लेती बुदबुदा उठी। 


 “भला आने वाले को कोई रोक सका है क्या? कृष्ण ने भी तो जन्म लिया था सलाखों के पीछे!”


प्रेरणा गुप्ता 


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