लघुकथा
परदेसी घर आया
कैनेडा में बसे दस वर्ष बीत गए इस बीच कई बार नौकरी बदली। सकून की तलाश मे बहुत
खाक छानता फिर रहा था कि एक दिन घर से एक खत आया काका घर आजा चाचे की तबियत खराब है।
मन दूर भारत में पंजाब के गाँव में बने घर में पहुंच गया । जहांँ शाम होते ही तंदूर गरम होता था जिस पर ताई और माँ मिलकर रोटियां लगाती गीत गाती और सारे टब्बर को खाना खिलाती फिर खुद खाती। अब ना मांँ है, ना वो रौनकें ।
पिता का ख्याल निक्के की बहू रखती है। कितना कहा चलों मेरे साथ पर वतन से जुदा होकर नहीं रहना पुत्तर कह कर टालते रहे । फ्लाइट पकड़ी और आ गया भारत गांव भी बदला सा लगा अब कोई इमारत कच्ची नहीं थी सब आलीशान बंगले बने थे लेकिन सब सुनसान लग रहे थे। केब वाले से पूछा सुंदर सुंदर बंगले बने हैं टंकियां भी डिजाइनर किसी के घर पर प्रेशर कुकर तो किसी के घर पर हवाई जहाज नुमा पानी की टंकी बनी थी।
लेकिन सभी घरों के दरवाजे बंद क्यों पड़े हैं ? इस गांँव के सब लड़के कैनेडा डालर कमाने चले गए ।
घर में अब कोई रहा नहीं । यह गाँव अब इन
खाली बंगलों के नाम से जाना जाता है। घर आ गया, केब से उतर कर देखा घर की जगह अब एक
शानदार बंगले में रुपांतरित हो गयी थी। जो घर मेरी यादों में बसा था, वो अब कहीं भी नजर नहीं आया।
पिता के करीब पहुंच कर कहा पेरीपोना दारजी कमजोर सरदार इन्द्रजीत सिंह ने पलकें उठाई तो पलंग के पास अपने पुत्तर को देखकर उठने की
कोशिश कि मगर व्यर्थ सांसों की डोर छूट गई । इस पल का ही इंतजार था । दारजी आपका
पुत्तर अब हर रोज हवेली दीया रोशन करेगा यह बंगला डालर के लिए वीरान नहीं होगा।
आज वो सकून मिल गया जिसे पिछले दस वर्ष से जिसकी तलाश में भटक रहा था ।
अर्विना
ग्रेटर नोएडा
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