सीमा वर्मा
लघुकथा
अपना- अपना आसमां
अनुराधा चहलकदमी करती हुई बार-बार घड़ी देख रही थी। उसकी आंँखें नम हुई जा रही थीं। गौरव को उसने घर आने के लिए फ़ोन कर दिया था। तभी बाहर गाड़ी का हॉर्न बजा। उसने देखा वह अंदर आ चुका था। आते ही नमस्ते करता हुआ बोला:
"कहिए आंटी जी ! क्या हुक्म है?"
गौरव उनके बेटे राहुल का दोस्त है। जब से वह विदेश गया है। यही उनका ध्यान रख रहा है। उनके एक फोन पर भागा चला आता है।
शब्द जैसे उसके गले में फंँस गए हों रुंधे गले से वह बोली, " मैं तंग आ गई हूँ। नहीं रह सकती अब इनके साथ। मुझे तलाक चाहिए।"
"तलाक?"
वह जैसे आसमान से गिरा। एक बार तो लगा आंटी जी मजाक कर रही हैं। मगर
उनके चेहरे की उदासीनता तो कुछ और कह रही थी।
"यह क्या कह रही हैं, आप? ऐसा सोचा भी कैसे?"
गौरव अभी भी हतप्रभ था।
"अब और क्या कहूँ, सारी जिंदगी अपने हर शौक को मारा। जैसे इन्होने चाहा मैं
चली, आखिर कब तक? अब मुझे मेरा आसमां चाहिए।"
एक दृढ़ निश्चय के साथ वह बोली।
"मतलब!"
"तुम नहीं समझोगे! मुझे आर्ट क्लासेज ज्वाइन करनी है। मगर यह मना कर रहें हैं।
कहते हैं, अब इस उम्र में क्या जरूरत है?"
वह शिकायती लहजे में बोली।
इतने में अंकल जी भी कमरे में आ गये। आते ही उनकी तरफ़ देखते हुए बोले:
"मुझे अकेला किसके सहारे छोड़ दोगी?"
कहते हुए वह लगभग रो दिए।
"क्या मैं सारा दिन वहीं रहूंगी?
कुछ घंटों की ही तो बात है।"
आंटी जी जैसे ठान चुकी थी।
"मैं जानता हूँ । जब तुम किसी काम में खो जाती हो तुम्हें आस पास की सुध- बुध भी नहीं रहती। मैं क्या करूंगा अकेले तब?"
फिर संभलते बोले:
"ठीक है अगर तुम्हारा यही मन है तो जाओ, मैं बीच में नही आऊंगा।"
"यह हुई ना बात!"
माहौल को खुशनुमा बनाने के इरादे से गौरव ने ठहाका लगाया और बोला:
"अंकल आप भी तो माउथ आर्गन बजाते थे, आप भी अपना शौक पूरा कीजिए आंटी को अपना करने दीजिए।"
"अच्छा याद दिलाया तुमने!"
अंकल ने अलमारी से उसे निकाला और बजाने लगे।
उन दोनों के बीच का अवसाद गायब हो चुका था अब संगीत में रंग घुलने लगे थे।
सीमा वर्मा
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