शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

खुले पंख, जागृत समाज, निदान लघुकथाकार विभा रानी श्रीवास्तव



लघुकथा  


 खुले पँख 


"मैं आज शाम से ही देख रहा हूँ.. 

आप बहुत गुमसुम हो अम्मी! कहिए ना क्या मामला है?"

"हाँ! बेटे मैं भी ऐसा ही महसूस कर रहा हूँ.. 

बेगम! बेटा सच कह रहा है।

तुम्हारी उदासी पूरे घर को उदास कर रही है.. 

अब बताओ न।" 

 शौकत मलिक ने अपनी

बीवी से पूछा।

"कल रविवार है.. 

 हमारे विद्यालय में बाहरी परीक्षा है आन्तरिक(इन्टर्नल) में जिसकी नियुक्ति थी ।उसकी तबीयत अचानक नासाज हो गई है। उनका और प्रधानाध्यापिका

दोनों का फोन था कि मैं जिम्मेदारी लेकर अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करूँ।"

"यह जिम्मेदारी आपको ही क्यों .. 

 और शिक्षिका भी तो आपके विद्यालय में होंगी?"

बेटे ने तर्क देते हुए पूछा।

"ज्यादातर बिहारी शिक्षिका हैं। आंध्रा में बिहार निवासी दीवाली से पूर्णिमा तक पर्व में रहते कहाँ हैं।" 

 मिसेज मलिक की उदासी और गहरी हो रही थी।

"चिंता नहीं करो, सब ठीक हो जाएगा।" 

बेटे ने कहा।

"हाँ! चिंता किस बात की। अपने आने में असमर्थता बता दो कि माँ की देखभाल करने वाली सहायिका रविवार की सुबह चर्च चली जाती है। तुम्हारा घर में होना जरूरी है।" 

पति मलिक महोदय का फरमान जारी हुआ। सहमी सहायिका ने भी लम्बी सांस छोड़ी।

"कैसी बात कर रहे हैं पापा आप भी? अगर आपके ऑफिस में ऐसे कुछ हालात होते तो आप क्या करते?"

"मैं पुरुष हूँ, पुरुषों का काम बाहर का ही होता है।"

"समय बहुत बदल चुका है। बदले समय के साथ हम भी बदल जाएं। कल माँ अपने विद्यालय जाकर जिम्मेदारी निभायेंगी। सहायिका के चर्च से लौटने तक घर और दादी को हम सम्भाल लेंगे।"

"बेटा! तुम ठीक कहते हो... घर चलाना है तो आपस में एक दूसरे की मुश्किलों को

देख समझकर ही चलाना होगा.. 

तभी जिंदगी मज़े में बीतेगी...।"

इतने में उनकी नज़र पिंजरे में बंद पक्षी पर जा पड़ी जो शायद बाहर निकलने को

छटपटा रहा था.. 

 पिंजड़ा को खोलकर पक्षी को नभ में उड़ाता बेटे ने कहा: 

"सबको आज़ादी मिलनी ही चाहिए।"




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लघुकथा 


जागृत समाज 


पुस्तक मेला में लघुकथा / काव्य पाठ समाप्त होते ही वे बुदबुदाये: 

"ईश्वर तूने आज सबकी प्रतिष्ठा रख ली।"

बगल में बैठे मुख्य अतिथि उनके मित्र के कानों में जैसे ये शब्द पड़े उन्होंने पूछा: 

"क्यों क्या हुआ?"

"अरे! तुम नहीं जानते... 

मैं आयोजन में अध्यक्षता तो जरूर कर रहा था। परंतु मन

में एक अजीब सा डर भी समाया हुआ था.. 

बकरे की अम्मा सा.. 

कहीं यहाँ कोई घमासान

हुआ तो...!"

"क्यों?"

"ओह्ह! आज सुबह तुमने सुना नहीं क्या? अयोध्या राम मंदिर के विषय में, उच्च

न्यायालय का क्या निर्णय आया है..?"

"हाँ! सुना तो है... 

पर ऐसा आपने क्यों सोचा...?"

"तुम समझ तो सब रहे हो फिर भी पूछ रहे हो...!"

"भाई जान! आज समय काफी बदल गया है... 

 ख़ुदा का शुक्र है। सभी समुदाय के लोग पूर्व की अपेक्षा साक्षर ही नहीं अब सुशिक्षित भी हो रहे हैं... 

 वे जानते हैं... 

सम्प्रदायों की क्षति किसमें है और लाभ किसमें है। फूट डालो राज करो अब सफल नहीं होने वाला।"

संध्या हो चुकी थी... एकाएक पूरा मैदान बत्तियों से जगमगा उठा। 



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लघुकथा 


निदान 


भारत और वेस्टइंडीज के मध्य क्रिकेट का मैच चल रहा था और ऋत्विक जो कि क्रिकेट का ना मात्र शौकीन था, अपितु अपने महाविद्यालय  की क्रिकेट टीम का एक खिलाड़ी भी

उसकी आँखें टी.वी. स्क्रीन पर गड़ी हुई थी। वह भारत की बालिंग एवं वेस्टइंडीज की बैटिंग बड़े गौर से देख रहा था...। 

 भारत की बॉलिंग और फील्डिंग पर वह बार-बार

मोहित हुआ जा रहा था। उसे टीम के प्रत्येक सदस्य का तालमेल लुभा रहा था। तो

वेस्टइंडीज की बिखरी–बिखरी बैटिंग पर वह भीतर ही भीतर क्रोधित हो रहा था...।

वेस्टइंडीज के लगातार चार खिलाड़ियों के आउट होते ही उसके मुँह से अकस्मात्

निकला,-"इस टीम की हार तो निश्चित है।"

बगल में बैठे उसके छोटे भाई ने कहा: 

"अभी तो बैटिंग हेतु उनके खिलाड़ी बाकी हैं.. 

अभी से ही भैया आप ऐसा कैसे कह सकते हैं..?"

"छोटे! तू नहीं समझेगा... जहाँ बिखराव हो वहाँ हार निश्चित है... 

भारत ने बॉलिंग एवं फील्डिंग की तरह ही यदि आपसी तालमेल से बैटिंग की तो उनकी जीत

निश्चित है।"

"हूँ ह.. ये.. तो है भैया!"

अपनी बात के साथ ही ऋत्विक के मन–मस्तिष्क में अंकित होने लगे नित्य प्रतिदिन के आपसी लड़ाई-झगड़े... 

अभी वह इन मानसिक उलझनों में उलझ सुलझ ही रह था कि बाहर से सबसे छोटा भाई रोते हुए दाखिल हुआ । 

"भैया! मोहल्ले के हातिम और उसके भाई ने मिलकर मुझे पीटा है... " 

इतना कहते हुए वह अपने कमरे में चला गया।

उसके मुँह से अकस्मात् निकला। 

"अब मेरा कोई भाई या किसी और का भी भाई ऐसे रोता नहीं आएगा.. 

हम सब भाई आपस में प्यार-मोहब्बत से मिलकर उदाहरण बनकर रहेंगे और

किसी भी समस्या का समाधान मिलकर करेंगे।"

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विभा रानी श्रीवास्तव (वर्त्तमान में कैलिफोर्निया में निवास)

- डाक पता

डॉ. अरूण कुमार श्रीवास्तव

104–मंत्र भारती अपार्टमेंट

रुकनपुरा , बेली रोड

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