लघुकथा
थप्पड़
"हे रोली! कम ऑन यार। क्या बेकवर्ड बर्ड साउंड कर रही हो?
हम भारत में नहीं, विदेश के खुले माहौल में है।
"रोमी ने रोली को निकट खींचते हुए कहा।
"व्हाट डू यू मीन रोमी?
अगर हम विदेश में हैं, तो क्या अपना लक्ष्य भूल जाएँ?
बिंदास हो कर पैरेंट्स के भेजे पैसों से ऐश करें?"
खुद को रोमी की पकड़ से छुड़ाने की कोशिश करते हुए क्रोध की लाली रोली के मुख पर आ गयी थीं।
"अरे यार, भारत के दकियानूसी रिवाजों को छोड़ दो अब। खुली उन्मुक्त हवा में जीवन का आनंद लो।"
रोमी पर शैंपेन का हल्का सुरूर चढ़ चला था।
"रोमी, मत भूलो हम यहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने देश के लिए कुछ करने का
ख्बाव लेकर, मेहनत कर के आये हैं। ये सब करने नहीं।"
"हा हा हा! तुम लड़कियाँ खूब जानती हो कि हमें ना, ना करके कैसे उकसाया जाए! इतनी सती सावित्री हो तो एक रुम शेयर क्यों कर रही हो?"
रोमी के शब्दों में नीचता की बू आने लगी थी।
"एक शहर के होने के साथ, हमारी फैमिली के प्रगाढ़ रिश्तों पर विश्वास के कारण। पर मुझे कमजोर समझने की भूल मत करना। समझे....
कहते हुये रोली ने अचानक रोमी का हाथ कस कर पकड़ लिया, और उसे कमरे से बाहर धकेलते हुए दरवाज़ा बंद कर दिया।
"मेरे परिवार के विश्वास, संस्कार और पालन पोषण की जड़े कमजोर नहीं समझे।"
अब वह आश्वस्त थीं।
मनोरमा जैन पाखी
भिंड ,म.प्र.
