लाजपत राय गर्ग
पंचकूला-134113
मो.92164-46527
लघुकथा
फ़रिश्ता
छत पर अपनी चारपाई पर लेटा सात-आठ वर्ष का चंदन तारों को निहारता हुआ दादी के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। दादी से कहानी सुनते-सुनते ही उसे नींद आती थी।
कुछ मिनटों बाद दादी आयी और बोली -
‘बेटा चंदन, तू अभी सोया नहीं?’
‘क्या करूँ दादी, जब तक आप कहानी नहीं सुनाती, मुझे नींद नहीं आती।’
‘राजा बेटा, आज बहुत देर हो गयी आने में। आज बिना कहानी सुने ही सो जा। रात बहुत हो गयी है।’
‘नहीं दादी। आप कहानी नहीं सुनाओगी तो मुझे नींद भी नहीं आयेगी।’
पोते की ज़िद के आगे दादी हार गयी और बोली - ‘अच्छा, आज तुझे कहानी नहीं,
आपबीती सुनाती हूँ।’
‘दादी, यह आपबीती क्या होती है?’
‘बेटे, आपबीती वो होती है जो हमारे साथ घटी हुई सच्ची घटना होती है।’
‘तो दादी, आप अपने साथ घटी कौन-सी और कब की घटना सुनाओगी?’
‘आज से तीस साल पहले जब पाकिस्तान अलग देश बना तो हमें वहाँ से यहाँ आना पड़ा।’
‘पहले आप पाकिस्तान में रहते थे?’
‘जब हम वहाँ रहते थे, तब पाकिस्तान नहीं था बल्कि सारा ही हिन्दुस्तान था।
1947 में जब पाकिस्तान अलग देश बना तो वहाँ रहने वाले हिन्दुओं और सिक्खों को अपने मकान-दुकान-ज़मीन छोड़ कर इधर के हिन्दुस्तान में आना पड़ा।’
‘यह सब क्यों हुआ?’
‘बेटे, अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान छोड़ते समय देश को दो हिस्सों में बाँट दिया था। पाकिस्तान वाले हिस्से में मुसलमानों की अधिक आबादी थी। दूसरे, इधर से बहुत मुसलमान पाकिस्तान में गये तो उन्होंने मारकाट करके वहाँ रह रहे हिन्दुओं और सिक्खों का सब कुछ लूट लिया और उन्हें या तो मार दिया या ख़ाली हाथ वहाँ से निकाल दिया।’
‘दादी, सारे मुसलमानों ने ऐसा किया?’
‘नहीं बेटे। बहुत से मुसलमानों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए भी अपने पड़ोसियों की हर तरह से मदद की।’
‘दादी, इसमें आपबीती क्या हुई?’
‘बेटे, तेरे दादा जी ने कुछ दिन तो इंतज़ार किया कि कुछ दिनों में दंगे शान्त हो जायेंगे, किन्तु जब दंगे बढ़ते ही गये तो तेरे दादा जी ने वहाँ से निकलने की
सोची। अपने पड़ोसी शराफ़त अली को तेरे दादा जी ने जब बताया कि हम जा रहे हैं और उसको घर की चाबियाँ सौंपते हुए कहा कि यदि हम वापस न आ पाये तो वही हमारे मकान को सँभाले तो उसकी आँखों में आँसू आ गये। बेटे, उनके साथ अपने परिवार का कई पीढ़ियों से सम्बन्ध था।’
‘तो क्या अपना सब कुछ शराफ़त अली को दे दिया था?’
‘नहीं बेटे। उसने खुद तेरे दादा जी को कहा कि भरा जी, आप पैसा-टका और गहने आदि छुपा कर ले जाने का प्रबन्ध कर लो और मैं बॉर्डर तक साथ जाकर छोड़ कर आऊँगा।’
‘फिर तो अपना अधिक नुक़सान नहीं हुआ।’
‘ऐसा नहीं बेटे। जब हम बॉर्डर की तरफ़ आ रहे थे तो कुछ गुंडों ने हमें घेर लिया। शराफ़त अली ने बहुत मिन्नतें कीं किन्तु उन्होंने हमारे सन्दूक और अटैचियों की तलाशी ली और सारी नक़दी छीन ली। गहने मैंने अपने शरीर के साथ इस तरह से छुपाकर बाँध रखे थे कि किसी को शक होना मुश्किल था। गुंडों में से एक ने तेरे दादा जी पर छुरे से वार करने की कोशिश की किन्तु शराफ़त अली ने बीच में उनका वार विफल कर दिया और खुद एक ईंट उठाकर उनकी तरफ़ उछाल दी जो एक गुंडे के सिर में लगी। बाक़ी गुंडे उसे वहीं छोड़कर भाग गये, क्योंकि उन्होंने मिलिटरी की जीप आती देख ली थी।’
‘दादी जी, शराफ़त अली तो फ़रिश्ता था। मैं तो समझता था कि सारे मुसलमानअत्याचारी थे।
‘नहीं बेटे, ऐसा नहीं होता। कुछ लोगों की ग़लतियों के लिये सारी क़ौम को दोषी नहीं मान सकते।’
लाजपत राय गर्ग
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