लघुकथा
दोषी कौन
"जब भी अखबार पढ़ते हो, मुस्कुराते क्यों हो? पढ़ने के बाद बिटिया से लाड़ लड़ाते
समय तुम्हारे चेहरे पर गर्व साफ-साफ दिखता है!"
रमेश को छेड़ती हुई सोनी ने कहा।
सुनकर फिर से रमेश मुस्कुरा पड़ा।
"लग रहा है तुम अपनी माँ के उलाहनों को भूल गए हो?"
"नहीं रे, मैं कुछ भी नहीं भूला हूँ। बल्कि मुझे मेरे डिसीजन पर गर्व है।
दो चार बच्चे पालने का जमाना गया।"
"फिर यह मंद-मंद मुस्कुराने का राज क्या है?"
"तुम नहीं समझती! रोज अखबार में बेटों के द्वारा अपमानित हो, बेघर हुए माँ-बाप की खबरें पढ़कर दुःख होता है। अच्छा है कि मेरा कोई बेटा नहीं है। ‘बेटियां
माँ-बाप की ताजिंदगी सेवा करती हैं’ यह सुनकर तो मुझे बेटी का बाप होने पर
गर्व होता है। "जैसे - जैसे बिटिया बड़ी हो रही थी, पत्नी से कहते हुए रमेश के इन शब्दों का वजन भी बढ़ता जा रहा था।
अतीत के समुन्दर में गोते लगाए हुए रमेश को सोनी ने उबारा: "क्या हुआ जी! कहाँ
डुबकी लगाए हुए थे।"
"कहीं नहीं, तुझसे ही तो बतिया रहा था।"
"तुम भी न..!”
लजा गयी।
"अरे, तू चाय क्यों बना लाई..!
पैरो से चला नहीं जाता, लेकिन पति सेवा जरूर
करेगी!"
चाय हाथों में देखकर रमेश ने कहा।
"पकड़ो..!
वर्ना हाथों में भी अब इतनी जान नहीं है कि देर तक दो प्याला पकड़े खड़ी रहूँ।"
"बिटिया आ रही?"
चाय का प्याला पकड़कर आस भरी निगाहों से देखते हुए पूछा।
"नहीं, कह रही थी कम्पनी में बहुत काम है और आपके दामाद को भी छुट्टी नहीं मिल
रही है।"
"तूने बताया नहीं उससे कि मैं बहुत ज्यादा बीमार हूँ।"
"बताया..।"
ठंडी श्वास छोड़ते हुए वह बोली।
" जल्दी ही छुट्टी लेकर आने को बोली होगी।"
चाय की चुस्की लेते हुए मुस्कुराएं।
"नहीं, कह रही थी दोनों जन किसी अच्छे से हॉस्पिटल में जाकर दिखा आइए। पूरे
शरीर की जाँच करवा लीजिएगा।"
चाय में पड़ी फपड़ी हटाती हुई एक घूँट लेकर फिर बोलना जारी रखा।
मैंने कहा - "रुपये बहुत लगेंगे न! तेरे पापा ने तो कुछ भी बचा के नहीं रखा।
सब तेरी पढ़ाई और शादी में खर्च कर दिया। ले-दे-के यह मकान बचा है।"
" फिर क्या बोली वह!" लंबी-सी साँस लेते हुए पूछा।
"कह रही थी कि रुपयों के लिए 'मौके का मकान' नहीं बेच दीजिएगा। डॉक्टर से मेरी बात करा दीजियेगा।जितना भी लगेगा मैं सीधे उनके अकाउंट में ट्रांसफर कर दूँगी।"
"हुअ..!"
"अच्छा माँ! काम बहुत है, फिर बात करूँगी। बाय...' कहकर फोन काट दिया उसने!"
गरम चाय की अंतिम घूँट लेते हुए रमेश ने ठंडी आह भरी। फिर क्षितिज की ओर देखकर मुस्कुराने लगे।
"अब भला क्यों ?"
व्यंग्य पूर्वक सोनी हठात बोली।
"अरे पगली इसलिए कि दोष बेटे-बेटी का नहीं है।आजकल के माहौल का ही है।"
वातावरण में अब अजीब-सा सन्नाटा पसर गया था।
सविता मिश्रा "अक्षजा'
९४११४१८६२१
आगरा
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Savita सविता Mishra मिश्रा ‘अक्षजा’
