गुरुवार, 5 नवंबर 2020

लघुकथा : रिलीवर

लघुकथा 


रिलीवर 



                              उदय श्री ताम्हणे 


रिलीवर  


ट्रिंग .... ट्रिंग .... ट्रिंग.... ट्रिंग....

टेलीफोन की घंटी बजी। श्रीमती जमुना देवी ने रिसीवर उठाया। 

"हेलो !"

दूसरी ओर से बेटे कुमार की आवाज सुनकर माँ ने फ़ोन से ढेर सारा आशीर्वाद दे दिया। 

" माँ तुम्हारी तबियत कैसी है ? "

"तुम समय पर दवाई लेती हो या नहीं ?"

" बाबूजी का कैसा चल रहा है ?"

पुरे आठ माह बाद बेटे का फोन आया है सो उसके पास सवालो का जखीरा होना स्वाभाविक ही है। माँ ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी बेटे कुमार के परिवार की पूरी तहकीकात की। 

बात को आगे बढ़ाते हुए कुमार ने कहा - " माँ हमारा एक माह का टूर पैकेज है। तुम बाबूजी को मनाकर यही आ जाओ। आज -कल नौकरो पर भी नजर रखना पड़ती है। मैने आप दोनों का १७ तारीख का छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से " नई दिल्ली के लिए ऑनलाइन रिजर्वेशन करवा लिया है।"

माँ केवल सुनती रही। 

प्रत्युत्तर न पाकर बेटे ने पूछा:  "माँ तुम सुन रही हो न ?"

 " हां मै सुन रही हुं "माँ बोली। 

" अच्छा माँ मै फोन बंद कर रहा हुं।  " खट !

फोन का रिसीवर रख कर श्रीमती जमुना  देवी सूटकेस में कपडे रखने लगी। 

उदय श्री. ताम्हणे 

भोपाल मध्यप्रदेश भारत