गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

डॉ. शील कौशिक की लघुकथा कलाकार

 डॉक्टर शील कौशिक की द्रवित करने वाली लघुकथा है,  "कलाकार" मानव के मनोभाव का प्रभाव उसके कार्य रुप पर अवश्य पडता है। पढ़िए।



संक्षिप्त सारस्वत परिचय

हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ महिला रचनाकार सम्मान प्राप्त 

डा. शील कौशिक 

जन्म 

 19.11.1957 

 फरीदाबाद 


शिक्षा: एम.एससी, एल.एलबी,  एम.एच.एम(होम्योपैथी) 

सम्प्रति: सेवानिवृत्त जिला मलेरिया अधिकारी, स्वास्थ्य विभाग, हरियाणा। 

प्रकाशित पुस्तकें : कुल 30

मौलिक: 21, सम्पादित:5, अनुवादित:3, लेखिका पर पुस्तक-1

कहानी -संग्रह :महक रिश्तों की , एक सच यह भी
लघुकथा -संग्रह : उसी पगडण्डी पर पाँव, कभी भी- कुछ भी, मेरी चुनिंदा लघुकथाएं 

कविता - संग्रह : दूर होते हम, कविता से पूछो, कचरे के ढेर पर जिंदगी,कब चुप होती है चिडि़या, खिडक़ी से झाँकते ही, मासूम गंगा के सवाल 

बालक कहानी - संग्रह: बचपन के आईने से व धूप का जादू,  करें तो क्या करें, माशी की जीत 

बाल कविता-संग्रह: बिल्लो रानी 

पंजाबी बाल कथा-संग्रह:रिमोट वाली गुड्डी 

अनुवादित पुस्तकें: कदै वी कुझ वी व इक सच ऐ वी, पंजाबी में 

आलोचना व समीक्षात्मक पुस्तकें: हरियाणा की महिला रचनाकार : विविध आयाम, मधुकांत की कहानी यात्रा, रूप देवगुण की कहानियों में सामाजिक संदर्भ। 

सम्पादित पुस्तकें: सिरसा जनपद की काव्य सम्पदा, सिरसा जनपद की लघुकथा सम्पदा, सिरसा लघुकथा का स्वर्णिम इतिहास, बहुआयामी व्यक्तित्व रूप देवगुण, भावुक मन की लघुकथाएं। 

सम्मान व पुरस्कार: हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा 2014 में श्रेष्ठ महिला रचनाकार सम्मान व लघुकथा - संग्रह कभी भी -कुछ भी को श्रेष्ठ कृति पुरस्कार सहित देश भर की प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा 50 से भी अधिक सम्मान ,कृतिकार सम्मान व पुरस्कार प्राप्त 

डॉ शील कौशिक 

पता:

 मेजर हाउस-17,हुडा सेक्टर-20, सिरसा- 

125056 हरियाणा। 

 मो. 94168-47107
इमेल-sheelshakti80@gmail.com 

लघुकथा 

कलाकार 

               मोहन और उसकी पत्नी रेखा डॉ. देव के पास चैकअप कराने गयेI 

 डॉ. देव प्रति वर्ष नवरात्रों में पंडाल सजाने के लिए दुर्गा माँ की प्रतिमा मोहन से लेते थे I
         “बच्चा बिलकुल दुरुस्त हैI वैसे है तो यह मेरे उसूलों के खिलाफ़ और कानूनन अपराध भी है, पर तुम तो देवी के भक्त हो इसलिए तुम्हें बताए देता हूँ, “तुम्हारे घर सचमुच देवी आने वाली है,” 

 डॉ. ने ख़ुशी प्रकट करते हुए कहा I  
तुम्हारे घर में देवी...

 उसके सिर पर हथोड़े से बजने लगे I वह चिंतित हो गया I माँ की कही बात उसके जहन में घूमने लगी– 

 ‘हमारे खानदान में पहली बार लड़की होने पर फिर लड़कियाँ ही होती रहेंगीI इस बात पर मेरे शंका करने पर माँ ने मुझे कितने ही उद्धरण गिना दिए थेI’ 

 कुछ देर की कशमकश के बाद उसने मन में ठान लिया कि नवरात्रों के बाद वह पत्नी का गर्भ गिरवा देगाI 
     नवरात्रों के आने में केवल पन्द्रह दिन शेष रह गये थेI 

अभी उसे बहुत सी मूर्तियों को अंतिम रूप देना थाI वह तन्मयता से अपनी छोटी सी कोठरी में मूर्तियाँ घड़ने में जुट गया I वह मिट्टी से अंगों को आकार देने का प्रयास करता पर बार-बार प्रतिमा के अंग स्वयं ही क्षत-विक्षत हो जाते I उसकी पत्नी रेखा भोजन करने के लिए कई बार बुला चुकी थी, पर वह भूखा-प्यासा पूरी श्रद्धा और विश्वास से फिर-फिर मूर्तियाँ ठीक करने में जुटा हुआ था I इस बार मूर्ति  ठीक बन गई I उसने सुख की साँस ली I परन्तु हाथ को आकार देते समय देवी का आशीर्वाद की मुद्रा वाला हाथ बार-बार नीचे लटक जाता I हार कर वह अब वह उसके नैन संवारने लगा, पर ये क्या? उसके लाख प्रयास के बावजूद वह पहले जैसी ममता और करुणा देवी की आँखों में न ला सका, वो सूनी ही रहीं I वह हैरान व परेशान था I सालों से वह मूर्तियाँ घड़ता आ रहा था पर ऐसा तो उसके साथ कभी नहीं हुआ I उसकी बनाई मूर्तियाँ इतनी जीवंत होती थी कि लोग देख कर हतप्रभ रह जाते और मुंह माँगा दाम देकर जाते थे I उसने अपनी पत्नी को इस डर से कभी प्रतिमाओं को हाथ तक नहीं लगाने दिया था कि कहीं कोई चूक न रह जाए और उसकी बनी-बनाई प्रतिष्ठा धूमिल हो जाये I हालांकि वह भी कुम्हार की बेटी थी और उसके पिता ने उसे बताया था कि रेखा बचपन में बहुत सुंदर माटी की गुड़िया बनाती थीI
मोहन हैरान व परेशान था I  
 उसने रेखा की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा I 


“हो सकता है इस बार तुम्हारी सोच दूषित हो, कहीं तुम मेरी सासु माँ की कही बातें तो नहीं ... 

” पत्नी ने हँस कर कहा I 


उसे लगा जैसे रेखा ने मजाक में ही उसे सत्य से रू-ब-रू करा दिया हो I मोहन ग्लानि से भर उठा, 

“लो इस बार तुम माँ की मूर्तियों को संवारो,” 

कलाकार ने पत्नी के पेट पर हाथ फिराते हुए कहा I 

रेखा यह सुन कर एकदम चहक उठी, जैसे उसकी वर्षों की मुराद पूरी हो गई हो I 

 डाॅ. शील कौशिक