शनिवार, 9 जनवरी 2021

 बना के क्यों बिगाड़ा रे ..........

 


अक्सर बनती हो तुम ,

समंदर के किनारे ,

गीली रेत से ,

पेड़ / पर्वत / नदिया / घर / आदमी / औरत ,

और भी बहुत कुछ .......

फिर !

अचानक न जाने किस उधेड़ - बुन में ,

जो कभी समानेवाला है ,

समंदर के आगोश में ,

जिसे समंदर की लहरे बहाने ही वाली है ,

उसे ,

अपने ही हाथो से गिरा - मिटा देती हो ,

समंदर में बहा देती हो ,

विसर्जन कर देती हो

क्यों ?

क्या होती है तुम्हारी मंशा ? 

 * उदय श्री. ताम्हणे