मास्टर-की
डुगडुगी बज रही थी। मदारी अपनी लच्छेदार बोली से तमाशे के लिए वांछित भीड़ इकट्ठी कर चुका था।
"तो मेहरबान - कद्रदान... दिल थाम कर हो जायें तैयार।... आज जमूरा नया तमाशा दिखायेगा... क्यों जमूरा, दिखायेगा न?"
"हाँ उस्ताद! ... लेकिन, कैसा तमाशा?"
"जमूरे, आज एकदम नया तमाशा!"
भीड़ की उत्सुकता बढ़ गई।लोग जोर - जोर से ताली बजाने लगें।
"वाह उस्ताद!... गरीब का बेटा आइआइटी निकाला!"
जमूरा जितनी जोर से बोला, उस्ताद ने उतने ही तीव्रता से डुगडुगी बजाई --
"लेकिन किस्मत का दरवाजा तो बंद है।"
जमूरा : "समझ गया उस्ताद। गरीबी का ताला, उसकी किस्मत पर लटका... मेहनत हुई बर्बाद, जीवन का देखो तमाशा!!"
उस्ताद : "अरे नहीं रे! ये मेहरबान - कद्रदान मदद करेंगें, गरीब का बच्चा जरूर पढ़ेगा, मदारी का बेटा इंजीनियर बनेगा..."
डुगडुगी जोर-जोर से बज रही थी, भीड़ में सन्नाटा पसर गया।
जमूरा कटोरा लेकर भीड़ में घूमने लगा। कुछेक ने दस- बीस- पचास के नोट कटोरे में डालें, अधिकांश बिना दिये खिसकने लगें। फटेहाल मदारी की विवशता किशोर वय का आर्यन कितना समझा, पता नहीं। किन्तु उसने पापा की उंगली को कसकर पकड़ लिया। बेटे की अप्रत्याशित पकड़ से उसके मैनेजर पिता बेचैन हो गयें और उनका हाथ अनायास आर्यन के सिर पर आ गया। अब वह सहज हो गया, पिता के मन को सुकून मिला। तब तक जमूरा भी उनके सामने आ गया। उन्होंने वाॅलेट से अपना विजिटिंग कार्ड निकालकर उसके कटोरे में डाला और धीरे से कहा--
"कल ही बेटे के साथ बैंक आने को कहो, शिक्षा- ॠण की व्यवस्था हो जायेगी।"
वह तेजी से अपनी गाड़ी की तरफ मुड़ गयें।
बैंक का पता और फोन नंबर लिखे विजिटिंग कार्ड हाथ में थामे, मदारी जल्दी से उदास बेटे के पास पहुंचने को उद्धत था। उसके हाथ किस्मत की 'मास्टर-की' जो लग गई थी।
पूनम (कतरियार)
लघुकथा
जिम्मेदारी
"सुनो, तुमने फिर सारी सैलरी निकाल ली? समझते क्यों नहीं? डाॅक्टर ने भी हिदायत दी है, लीवर की बात है।"
कहते-कहते नीतू की आवाज़ भर्रा गयी। लगता है कि ऑफिस से वह रिपोर्ट लेकर सीधे डाॅक्टर के पास गयी थी।
"हाँ तो? कह दिया न कि पीना छोड़ रहा हूँ।
वो तो पीने में पुरानी उधारी रह गयी है, वही चुकता कर रहा हूँ।"
अजय के साफ झूठ को सुनते ही कातर आँखों से उसे देखती हुई नीतू सोफे पर रिपोर्ट रखती धीरे-धीरे भारी कदमों से अंदर कमरे में चली गई।
"और हाँ, कोई तुम्हारी सैलरी की मैं नहीं पीता।"
ऊँची आवाज में चिल्ला कर अजय ने कहा और मदिरा की आसक्ति में बाहर सड़क पर आ गया।
तिराहे पर पहुँचा तो देखा कि एक अर्थी गुजर रही थी। मरने वाले का बारह वर्षीय पुत्र, दाह-संस्कार के निमित्त आगे- आगे चल रहा था।
हठात् आज अजय विचलित हो गया...
"मदिरालय वाले रास्ते में ही तो आगे श्मशान भी है।"
उसे गर्भवती नीतू का कातर चेहरा याद आ गया। मन तीन-पाँच करता रहा और कदम आगे बढ़तें रहें। कुछ समय के बाद वह विपरीत दिशा में बने नशामुक्ति-केंद्र में खड़ा था।
पूनम (कतरियार)
परिचय :
नाम : पूनम (कतरियार)
शिक्षा : स्नातकोत्तर,
संत विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग (झारखंड)
संप्रति : लेखन
पता: 202,
ओम निलय अपार्टमेंट
बोरिंग कैनाल रोड पश्चिम,पटना-1
