डरपोक
लघुकथा
उदय श्री. ताम्हणे
मैं घर से बाहर निकला ही था, की दो व्यक्ति मेरे सामने से भागते हुये निकले! दोनों के हाथ मे कृपाण थी!
वे किसी बात पर झगड़ा करने के बाद अब एक दूसरे की जान के दुश्मन बन गए थे !
एक - एक करके मकानो के दरवाजे बंद हो रहे थे!
पूरा दृश्य मेरे सामने किसी फिल्म की शूटिंग की तरह चल रहा था!
मैं देखता हूं! एक व्यक्ति के पेट मे कृपाण की घातक चोट लग गई है! वह जमीन पर गिरकर तड़पने लगा है!
दूसरा उसे छोड़ कर भाग रहा है!
तभी मुझे पुलिस की जीप आती हुई दिखाई पड़ती है!
पुलिस के भयावह साक्षात्कार की कल्पना करके, मैं पलक झपकते गली में मुड़कर, अपने घर आ जाता हूँ ।
भोपाल मध्यप्रदेश भारत
रचना काल 1981
