लघुकथा
ज़ज्बा
आज काफी अन्तराल के बाद सुमन के साथ बैठकर नाश्ता कर रहा था। बीमारी और जीवन की आपाधापी में साथ रहते हुए भी ऐसे अवसर कम ही होते हैं।
नाश्ता करते हुए सुमन रुक गई। उसने डॉक्टर की दी हुई शुगर की टेबलेट मुँह में रखी और पानी का ग्लास उठाकर चार घुट पानी पी लिया।
मैं उसके चेहरे के उतार चढाव को नापने में लगा था। थरथराहट भरे हाथों से प्लेट उठाकर सुमन फिर नाश्ता करने में जुट गई थी।
मै अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था।
"सुमन : तुमने बेटे सुहास के सुझाव पर क्या निर्णय लिया?"
" देखिए ! संतोष जी, सुहास और उसका परिवार जहां रहना चाहे रहे। हम भारत मे ही रहेंगे।"
"हम आत्मनिर्भर थे, और आत्मनिर्भर ही रहेंगे।
उदय श्री
भोपाल
