मित्रों,
"चुनिंदा लघुकथाएं"
के अंतर्गत मधु जैन, जबलपुर की लघुकथाएं
कांजी हाउस
दिशा अपने जीवन की पहली कमाई हाथ में लिए बीती गलियों में भटक रही थी।
जब कभी भी नंदनी, संध्या वगैरह सखियाँ माल से लाए सामान दिखाती। कितनी मस्ती की, चाट पकौड़ी खाई बताती तो वह मन मसोस कर रह जाती। उसके यहां पैसों की कोई कमी नहीं थी। पर फिर भी...
उसके मुंह से निकली मंहगी से मंहगी हर फरमाइश पति पूरी करते हैं। पर उसके हाथ में पैसा देना उन्हें पसंद नहीं। घर खर्च को भी जो देते उसका हिसाब भी लेते। पति को उसका नौकरी करना बिल्कुल भी पसंद नहीं था और उसे पति के सामने हाथ फैलाना।
मां ने पापा से लड़- झगड़ कर उसे पढ़ाया था। मां का कहना था कि वह किसी की मोहताज न रहे। मां की आंखों की बेबसी आज समझ आई।
मां कहा करती थी, "हर किसी को एक हुनर तो आना ही चाहिए। वक्त बेवक्त काम आता है," और उसे सिलाई में निपुण कराया था।
उसने एक बुटीक से संम्पर्क कर पति के कार्यालय जाने के बाद घर पर ही काम शुरू किया।
वह खुश रहने लगी थी, खोया हुआ आत्मविश्वास वापस आने लगा था।
"दिशा, दिशा" की आवाज आई, लगता है पतिदेव को भनक लग गई है। अब महाभारत शुरू ही होगा। उसका कुछ भी कहना गर्म तवे पर पानी डालने का काम कर रहा था।
"तुम्हारी कौन सी इच्छा पूरी नहीं की, जो तुम्हें काम करने की जरूरत पड़ गई।" गरजते हुए बोले।
"कांजी हाउस में भी तो जानवरों को भरपेट भोजन मिलता है, पर क्या वे वहाँ खुश रहते हैं। पिंजरा सोने का ही क्यों न हो, हर हाल में होता तो पिंजरा ही है।"
गर्म लोहे पर जोरदार हथौड़ा मारते हुए दिशा कमरे से बाहर निकल गई।
मधु जैन
593 संजीवनी नगर जबलपुर
म. प्र. पिन 482003
मोबाइल 9407182120
हिटलर काकी
त्रिशा चार साल बाद अमेरिका से मायके आई थी। भाई- भाभी, बच्चे सभी उसे घेरे बैठे थे। बच्चों को अमेरिका के बारे में जानने की जिज्ञासा थी और माँ को उसके बारे में।
"बुआ वहाँ तो बहुत बड़ी बड़ी बिल्डिंग होती है। और सुना है धूल भी नहीं होती।"
"हाँ, सही सुना है। पर अपने गाँव में भी तो पक्की सड़कें बन गयी है। सफाई भी दिखाई दे रही है।"
"बुआ बहुत बड़ा माल भी खुल गया है।"
"अरे ! वाह बहुत तरक्की हो रही है।"
"इतनी तरक्की हो गई कि सभी को घर भी छोटा लगने लगा, सब अलग-अलग रहने लगे।" एक अनकहे दर्द भरी आवाज में माँ बोली
"पर बुआ गाँव में अभी भी हिटलर काकी का घर एक मात्र बचा है, जहाँ सभी एक साथ रहते हैं।"
"ये हिटलर काकी कौन है।"
"अरे! वही अपनी जमुना काकी।" कहते हुए मांँ की आँखें चमक उठी।
जमुना काकी का नाम सुनते ही बचपन की काकी आँखों के सामने आ गई। बड़ी सी लाल बिंदी,मुँह में पान, आँखों में वात्सल्य। पता नहीं, कब से नहीं मिली है वह काकी से।
"माँ मैं जमुना काकी से मिलकर आती हूँ।"
पैर छूते ही जमुना काकी ने गले से लगाकर आशीर्वादों से झोली भर दी। और ढेर सारे प्रश्नों की झड़ी लगा दी। त्रिशा उत्तर देती जा रही थी इसी बीच काकी की बहुएँ और नाती पोते भी पैर छू गये।
"अच्छा काकी चलूँ।"
"अरे! ऐसे कैसे? बेटियाँ बिना खाए घर से नहीं जाती।"
"दीदी, खाना बस तैयार है। आप खाना खाकर ही जाइएगा।"
इस प्यार भरी मनुहार पर हथियार डालना ही पड़ा।
"काकी एक बात पूछूँ।"
"हाँ बिटिया पूछ,झिझक कैसी ?"
"काकी सब आपको हिटलर काकी क्यों बोलते है।"
मुस्कुराते हुए "तूने पेपर में लगी पिन देखी है। जानती हो उसका काम।"
"हाँ काकी, पेपर को इकठ्ठा रखना, वह न हो तो पेपर बिखर जाएँगे।"
"मैं वही पेपर पिन हूँ। कभी कभी लोगों को चुभ भी जाती हूँ।"
मधु जैन जबलपुर
खिचड़ी
"दादी दादी आपने हमें दशहरा, दीवाली होली सभी त्यौहार क्यों मनाते तो बता दिया था, पर मकर संक्रांति क्यों मनाते हैं ? नहीं बताया।"
"सभी एक साथ आओ फिर बताती हूँ।"
"हाँ तो सुनो! मकर संक्रांति सूर्य उपासना का त्यौहार है। इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होता है और धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। इसलिए इस त्यौहार को मकर संक्रांति कहते हैं।"
"पर दादी इस त्यौहार में खिचड़ी क्यों खाते हैं ?"
घर की दोनों बहुओं के बीच हमेशा तनातनी बनी रहती है एक घर में रहते हुए भी एक-दूसरे से बात नहीं करती। वे भी आकर दादी के पास बैठ जाती है।
दादी उन्हें देख मुस्कुराती हैं।
"खिचड़ी का संबंध परिवार की खुशियों से है।"
"वो कैसे दादी ?"
"जैसे दाल चावल हैं तो अलग-अलग अनाज ,अकेला चावल और दाल नहीं खाते मिलाकर ही खाते है।"मधु
"और दादी सब्जी भी।"
"हाँ सब्जी तुम लोगों हो। हाँ तो जब दाल-चावल और सब्जी एक साथ मिलाकर बनाते हैं तो क्या बनती हैं ?"
"खिचड़ी" सभी एक साथ बोले।
"खिचड़ी खाते समय कोई यह नहीं बोलता कि दाल- चावल सब्जी खा रहे क्योंकि खिचड़ी शब्द में यह सब शामिल हैं।
ठीक वैसे ही जैसे हमारा मिश्रा परिवार, मिश्रा परिवार नाम लेने से तुम सभी शामिल हो जाते हो अलग अलग नाम लेने की जरूरत नहीं होती।"
"वाऊ! यू आर ग्रेट दादी।"
"पर खिचड़ी में एक बहुत जरूरी चीज होती है जो उसके स्वाद को बढ़ाता है बताओ क्या है वह ?"
बहुओं के सम्मलित स्वर में "घी।"
दादी ने मुस्कुराते हुए कहा "घी प्यार का प्रतीक है खिचड़ी में जितना घी डालोगे वह उतनी ही ज्यादा स्वादिष्ट होगी।" दोनों बहुएँ एक दूसरे को देख मुस्कुरा उठी।
मधु जैन
जबलपुर मध्यप्रदेश
जय श्री गणेश
जय हो
