मित्रों, "चुनिंदा लघुकथाएं" में सुरेंद्र कुमार अरोड़ा की लघुकथाएं पढ़िए
दुर्घटना
" तुम तो आज भी करीब - करीब वैसी ही हो । "
" वैसी मतलब ........? "
" उतनी ही आकर्षक !अच्छा मेंटेन किया है , आने एस्प को तुमने । इतने सालों में तुम्हारी हमउम्र शायद ही कोई इतनी सुंदर दिखती होगी । "
" बातें अब भी वैसी ही बना लेते हो । अधेड़ हो चले हो , फिर भी महिलाओं को इम्प्रेस करने वाली आदतें गयीं नहीं । "
" जो सच में महसूस हुआ , वही तो कहा है । अब तुम्हें प्रभावित करके क्या पा लूँगा तुमसे ? "
" जिद्दी भी भी वैसे ही हो । नाक पर मक्खी नहीं बैठने देते । अपनी मनवाने की आदत जस की तस है । "
" मैंने तुमसे क्या मनवाया था ? तुम्हारी ही तो मानी थी । शुरुआत तुम्हारी थी कि तुम्हारे शब्दों में जादू है । एक एक किरदार को उसकी प्रकृति में इस तरह उतार देते हो जैसे वर्षों उसके साथ रहकर उसकी जिंदगी में डूबते - उतराते रहे हो । सारी वही बाते चुराकर अपनी कहानी में ले आते हो जैसे सब कुछ तुम्हारे सामने घटित हुआ हो ।
क्या करते नहीं हो ऐसा ? पिछले दिनों भले ही तुमसे कोई सम्पर्क नहीं था पर तुम्हारी लिखी कहानियां तो मिल ही जाती थीं । "
" तो ..........? "
" तो क्या उनमें कई जगह तो तुमने हूबहू उन संवादों को ही चुरा लिया जो कभी मैंने तुम्हें कहे थे । इसे ही तो चोरी कहते हैं । "
" तो हमारी पहली ही मुलाकात में तुमने क्यों कहा था कि मेरा स्थान पांचवा है और तुम शायद किसी महाभारत की नायिका हो । "
" तुम इतने अपने लगे थे कि जिसके सामने ये सच स्वीकार किया जा सकता था । इस विशवास के साथ कि मेरी खोज पूरी हो गयी है , पर .......!"
" पर क्या ? "
" क्या सब कुछ अभी ही कह दूं ? "
" जब शुरू किया है तो कहना ही होगा । मैंने आज तक कभी कुछ भी ऐसा नहीं किया है जो तुम्हारे उस समर्पण को लांछित करे । मुझे तो सचमुच ह्रदय की हर गहराई में लगाव हो गया था तुमसे । तुमने ही बिना देरी किये , अपनी दिनचर्या से मुझे बाहर कर दिया था । मैं चाहकर भी अपना दोष नहीं जान पाया । "
" मुझे खुद भी पता होता तब ही तो बताती न ।"
" जूनून की हद तक पहल भी अपनी और दूध में डली मक्खी को बाहर निकाल फैंकने की दुत्कार भी अपनी । जानती हो कितना दर्द झेला था मैंने ? "
" हाँ ! जरूर हुआ होगा पर क्या करती तुम्हारे सानिध्य को वरण करने की जिद मेरे शरीर के हर रोम में समा गयी थी ।
" फिर बाद में क्या हुआ उस जिद को , जो ......... ? "
" बस अब चुप रहो । जीवन में सब कुछ वैसा नहीं होता , जैसा हम चाहते हैं । कभी - कभी घटनाएं भी दुर्घटनाओं की तरह आती हैं जीवन में । "
" ठीक है दुर्घटना ही सही पर ये बताओ , आज इतने सालों बाद इधर कैसे आना हुआ ? "
" सच सच बताऊं क्या ? "
" क्या तुम झूठ भी बोलती हो ? "
" इतना तो जानते होंगे कि समय के साथ परिवेश भले ही बदल जाए पर अंतस्तल की गहराइयों में घर जमाये बैठी घटित घटनाएं कभी अपना स्थान नहीं बदलती ।खुद की परखने के लिए तुमसे मिलने की इच्छा ही आयी तो आना पड़ा । "
उसकी इच्छा हुई कि आगे बढ़े और उसे अपने अंदर समेट कर उस एक दिन को फिर से दोहरा दे पर अब वो किसी दुर्घटना को होने देना नहीं चाहता था । उसने सामने रखा पानी से भरा गिलास उठाया और उसे गटागट पी गया ।
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
प्रॉमिस
" नानू अब आप मेरे साथ खेलोगे। ठीक है ? " बच्ची बोली।
नानू के कोई उत्तर नहीं दिया।
बच्ची को लगा आज फिर नानू का मूड ठीक नहीं है। वे उदास है। वो सोच में पड़ गयी कि नानू का मूड कैसे ठीक हो। उसे याद आया नानू जब राम जी की कहानी सुनाते है तब बड़े खुश होते है कि छोटे से राम जी ने अपने भाई के साथ मिलकर ताड़का जैसी खराब लेडी को अपने तीर से कैसे मार दिया था। उसने कहा , " नानू ! मैं आपसे राम जी की ताड़का से लड़ाई वाली कहानी भी सुनुंगी। सुना दीजिये न प्लीज। "
नानू फिर भी कुछ नहीं बोले।
बच्ची ने विषय बदला। वो जानती थी कि नानू अपनी किताबों को देख कर बड़े खुश होते है और प्यार से उन्हें अलमारी में सजाते भी है। नानू की हर किताब पर नानू की फोटो भी होती है। उसने नानू से कहा , " नानू ! अपनी किताब निकालिये न प्लीज ! मैं उसकी एक कहानी सुनूंगी। "
नानू ने बच्ची की जिद पूरी करने की गरज से अनमने ढंग से अलमारी को खोला और एक किताब निकाल कर खोलने लगे।
बच्ची ने किताब को उनके हाथ से ले लिया और उस पर छपी नानू की तस्वीर को बड़े ध्यान से देखने लगीं। वे बेमन से बच्ची की हरकतों को देखते रहे। बच्ची अचानक बोल पड़ी , " नानू ! इस फोटो में आप कितने अच्छे लग रहे हो क्योंकि इसमें आप हंस रहे हो ! आप हमेशा ऐसे ही हँसते हुए ही अच्छे लगते हो। आप कभी भी गुस्सा मत किया करो। "
" ठीक है ! अब राम जी की कहानी सुनाऊँ ?" वे अब तक थोड़ा सामान्य हो चुके थे।
" गुस्सा नहीं करोगे ! प्रॉमिस। "
" यस बेटा ! प्रॉमिस। " वे मुस्कुरा दिए। बच्ची भी हंस दी।
उन्हें लगा जिंदगी को कुछ और साल मिल गए।
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद
रंगदारी
गुट्टू जी ने दूध वाले से कहा , " या लोट्टे में एक लीटर भैंस का दूध डाल दे ।"
दूध वाले ने लोटे को ध्यान से देखा और उसे उलट - पुलट कर उसका साइज देखते हुए कहा , " ये लोटा छोटा है , इसमें भैंस का एक लीटर दूध नहीं आ सकता । "
गुट्टू जी को रंगदारी वसूलने की जल्दी थी । वे टाईम खराब करने के मूड में भी नहीं थे ।दिमाग चाय की तलब से भन्ना रहा था । वे बोले , " म्हारी बात तेरी समझ में न आ री । बातें मती न बनावे । , भैंस का न आ सके त बकरी का एक लीटर डाल दे ।"
दूध वाला मजबूर था । उसने लोटा दूध से भरने में ही भलाई समझी ।
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद ।
(वर्तमान किसान आंदोलन के सन्दर्भ में)
लघुकथा
मेड़
दोनों खेत पड़ोसी थे। मिटटी भले ही एक जैसी थी पर बटवारे की वजह से दोनों के बीच चौड़ी सी एक मेड़ बना दी गयी थी।
बटवारे की वजह से मेड़ का आधा हिस्सा एक खेत में था तो दूसरा आधा हिस्सा दूसरे खेत में।
बुआई के बाद जो भी फसल बोई जाती ,वह अपने - अपने खेतों की सीमा में ही रहती। मेड़ पर घास का साम्राज्य रहता जिस पर किसी का अधिकार नहीं था।
बाएं खेत को ख्याल आया कि अगर मैं अपने हिस्से की मेड़ को छोटा कर दूँ तो तो मेरा छेत्र बढ़ जायेगा और मुझ ज्यादा फसल उगेगी। उसने फावड़े से अपनी तरफ की कुछ इंच मिटटी खोदकर दायीं तरफ डाल दी। इससे बायीं तरफ खेत की चौड़ाई बढ़ गयी और किसी को पता भी नहीं चला क्योंकि मेड़ की चौड़ाई तो उतनी ही बनी रही।
बायां खेत अपनी इस चतुराई पर मन ही मन खुश होता रहा क्योंकि इस बार उसकी मिटटी में पैदावार ,दाएं खेत की मिटटी से ज्यादा हुई। परन्तु इस बात से दायां खेत असमंजस में पड़ गया कि आखिर उससे चूक कहाँ हो गयी जो उसकी पैदावार बाएं खेत से कम निकली।
उसने तहकीकात के लिए कदम बढ़ाये तो उसे सब कुछ साफ़ - साफ़ दिखाई दे गया कि पड़ोसी खेत ने दोनों खेतों के बीच की हदबंदी के साथ छेड़छाड़ करके उसके साथ धोखा किया है। उसे अपने पड़ोसी की इस हरकत पर बहुत क्रोध भी आया। उसने सोचा कि इसकी चालाकी को तो अच्छा सा सबक मिलना चाहिए। मामला पड़ोस का था ,झगड़ा करने पर बात मरने - मारने की हो जाती।
इसी बीच प्रकृति ने न जाने कौन सा खेल खेला कि दोनों तरफ के खेत मानव के रूप में दिखने लगे।
काफी सोच - विचार के बाद दायीं ओर का मानव पड़ोसी खेत के करीब साझी बनी नयी हदबंदी पर खड़ा होकर बोला ," इस मेड़ के वे पाँव दिखाई नहीं दे रहे जिनके सहारे चलकर यह इस ओर खिसक आयी है। बाएं वाले मानव को लगता था कि उसकी चोरी कभी नहीं पकड़ी जाएगी पर वह तो पकड़ी जा चुकी थी। इसलिए झूठ भी नहीं बोला जा सकता था। उसने चोरी और सीना जोरी के सूत्र वाक्य को पकड़ते हुए कहा ," पाँव - शांव कुछ नहीं ,हमेशा बायां ही पीछे क्यों रहे ? उसे भी ऊपर आने का हक़ है।मेड़ को तो मैंने ही खिसकाया है , तुमसे जो करते बने कर लो।"
दाएं खेत वाले मानव ने बिना क्रोधित हुए कहा ," भाई गुस्सा क्यों होते हो।इस दिशा से आंकने पर इस साल तुम बाएं थे और मैं दायां । अगले साल हम हो सकता है हमें बायां या दायाँ तय करने की दिशा को बदलना पद जाये तब तुम दाएं हो जाओगे और मैं बायां कहलाऊंगा तो क्या तब भी तुम यही काम करोगे ? यदि करोगे तो तुम्हारी तो यही क्या , हर जिंदगी खेतों के बीच की मेड़ सरकाने में ही खपती रहेगी।तुम्हारे खेत वीरान पड़े रहेंगें। तुम फसल कब उगाओगे ?"
बाएं खेत वाले मानव को बात समझने में थोड़ा सा वक्त लगा परन्तु समझते ही बोला , " माफ़ करना मेरे भाई ! मेड़ को वहीं रहने दो ,जहाँ वह शुरू में थी।तुमने ठीक याद दिलाया ,मेड़ खिसकाने के चक्कर में खेती करना तो भूल ही गया था।
सुरेंद्र कुमार अरोड़ा साहिबाबाद
लघुकथा
जी साब जी
कुर्सी पर बैठते ही उन्होंने पी . ए . से कहा कि आदेश पारित कर दिया जाय , " सभी भूमाफियाओं , खनन माफियाओं , रिश्वतखोर अधिकारियों , कर्मचारियों , अवैद्य शराब बेचने वालों पर ऍफ़ - आई -आर दर्ज करवाकर मुकदमा चलवाया जाये और अपराधियों को गली - मोहल्ले के गुंडे -मवालियों के साथ जेल में बंद कर दिया जाये । " साब जी ये आदेश तो जबर्दस्त है । एक ही झटके में पिछली सरकार की वर्षों से चली आ रही सारी बदमाशों की जड़ों में मट्ठा डाल दिया । " सचिव ने कान में कहा । तो वे गर्व से मुस्कुरा दिए ।
" पर साब जी इसमें एक पेच है । " सचिव ने संशय व्यक्त किया ।
" वो कैसे ? अरे भाई हम मंत्री हैं ।जनता के हित में हम आदेश नहीं देंगें तो क्या बीट वाला सिपाही देगा ? " मंत्री जी ने हाथों को कुर्सी के हत्थों पर टिकाते हुआ पूछा ।
" साब जी , आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं । मंत्री होने के नाते आदेश तो आप ही देंगे । पर अगला इलेक्शन जिन लोगों के बल पर आपको लड़ना है , वे सारे जेल में होंगे तो आप मंत्री तो क्या संत्री की दौड़ में भी कहीं नहीं दिखेंगें । " सचिव ने चिंता जताई ।
मंत्री जी ने सचिव की ओर प्रश्नवाचक की दृष्टि से देखा ।
सचिव महोदय के हाथ बंधे हुए थे और वे नीचे की ओर देखते हुए मुस्कुरा भी रहे थे ।
" निर्मल जी आप मुस्कुरा रहे हैं . आप राज्य के सचिव हैं या विपक्ष के नेता हैं ? "
" साब जी , वर्षों से आपका नमक खा रहे हैं . नमक हरामी नहीं करेंगें . बिना शक हम सचिव तो हम आपके ही रहेंगे . " सचिव महोदय ने विनम्रता से उत्तर दिया परन्तु उनके होठों पर खिची मुस्कान की लम्बाई में कोई अंतर् नहीं आया .
" अरे ये राजतंत्र नहीं , लोकतंत्र है भाई . यहां जनता की आवाज सुनना हमारा कर्तव्य है ! कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे तभी हमें वोट मिलेंगें . अगर वोट नहीं मिले तो इलेक्शन में हार जायेंगे और चुनाव ही हार गए तो न तो हम मंत्री होंगें और न ही आप सचिव . हम उसके जान - माल की रक्षा नहीं करेंगे तो वे हमें वोट कौन देगा . " मंत्री जी उत्साहित थे .
" साब जी ! आदेश जरूर दीजिये पर आदेश से पहले माहौल बनाना पड़ेगा ." सचिव महोदय के शब्दों में ही नहीं चेहरे पर भी सस्पेंस उभर आया . थोड़ा रूक कर वे फिर बोलने लगे .
" साब जी ! कर्तव्यों की पूर्ति वाली बात तो ठीक है पर उसके साथ वोट पाने के लिए और भी बहुत कुछ साधना भी पड़ता है . असल में वोट , जनता देती नहीं , जनता से दिलवाये जाते हैं . जनता वोट हमें ही दे , इसके लिए आप जिन गुर्गों को हवालात में डालने का हुकुम दे रहे हैं , वही सब तो इलेक्शन के समय हमारी रीढ़ बनते हैं . "
" निर्मल जी , बहुत हो चुका इस तरह का गणित . कानून रहेगा तो व्यवस्था रहेगी और व्यवस्था रहेगी तो हम रहेंगें . " मंत्री जी ने निर्णय सुनाया ही था कि मोबाईल की घंटी बोल उठी , मंत्री जी ने मोबाईल पर निगाह डाली और उसे निर्मल जी की ओर बढ़ा दिया . निर्मल जी ने फोन को ध्यान से सुना और पूरी बात सुन लेने के बाद मंत्री जी की ओर मुखातिब हुए , " साब जी , प्रदेश के सबसे बड़े ज्वेलर जरीवाला भाई का फोन था , पिछले चुनाव में वे हमारे सबसे बड़े फाइनेंसर थे , आपके द्वारा होने वाले आदेश की सूचना उन्हें न जाने कैसे हो गयी है और वे चाहते हैं कि इस आदेश को पंद्रह दिन के लिए टॉल दिया जाये . "
" ऐसा क्यों चाहते हैं वे ? राज - काज देकना हमारा काम है और फिर बदमाशों को हवालात में बंद करना तो उनके हित में है ." मंत्री जी ने जिज्ञासा व्यक्त की .
" साब जी , उठाईगीर जो भी ज्वेलरी लूटते हैं , वो बिकती तो छोटे - बड़े सभी ज्वेलर्स के पास ही है न . जरीवाला चाहते हैं कि पंद्रह दिन मिल जाएँ तो गली - मोहल्लों में सक्रिय उनके गुर्गे अपने छिपने के अड्डे तलाश लेंगे . " निर्मल जी ने अंदर कि बात का खुलासा किया .
मंत्री जी का चेहरा जो हमेशा मुस्कान भरी गुलाबी लाली से ढका रहता था . गंभीर हो गए . कुछ देर के लिए पीलेपन ने उनकी तंद्रा को गमगीन कर दिया . उनकी मुद्रा गहरे सोच में डूब गयी . साफ़ लग रहा था कि वे गहरे धर्म संकट में हैं .
सचिव निर्मल जी , मंत्री जी की चिंतित मनोदशा के कारण उनके चेहरे पर आते - जाते अलग - अलग रंगों को उत्सुकता पूर्वक देख रहे थे पर वे निश्चिंत थे कि अब उन्हें किसी तरह के नए आदेश - वादेश जारी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी . जरीवाला भाई ने इस अनुकम्पा के बदले में पर्याप्त राशि का वायदा उनसे पहले ही कर दिया था जिसे वे मंत्री जी से छिपा गए थे .
" साब जी , चिंता न करें . ये तो राज - काज है , चलता ही रहता है . एक - आध दिन अच्छी तरह से विचार कर लें .जल्दी क्या है अगर आदेश जरूरी हुआ तो दो दिन बाद जारी कर देंगें . " निर्मल जी के दिमाग में दस लाख खेल रहे थे .
मंत्री जी अपनी कुर्सी से उठे . सामने की दीवार पर टंगी अपने पिता की तस्वीर को प्रणाम किया . उनके पिता ने श्री गिरधारी लाल जी ने जीवन भर मुफलिसी बर्दाश्त कर ली थी , परन्तु अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया था . उन्हें जेहन में उठ रहे सवालों का जवाब मिल गया था . वे सचिव की ओर मुखातिब हुए और बोले , " निर्मल जी ! जनता ने कुछ उम्मीदों के साथ हम पर विशवास किया है . हम सिर्फ जनता के प्रति जवाबदेह हैं . उनकी सुरक्षा हमारा धर्म है . आप इसी समय डी . जी . पी .साब को हमारे साथ अर्जेन्ट मीटिंग का आदेश दीजिये . कम्प्यूटर सेक्शन का सारा स्टाफ बुलवाइए . और अभी आदेश पारित करवाइये कि रातों - रात सभी हिस्ट्री - शीटर्स को हवालात में बंद कर दिया जाये . ये हमारा फाइनल आदेश है और हाँ ज्वेलर जरीवाला भाई कि सम्पत्ति का ब्यौरा इकठा करने की रिक्वेस्ट आई . टी . विभाग से करवा दीजिये . "
सचिव महोदय के चेहरे पर कुछ देर पहले तक फैली लालिमा को पीलेपन ने घेर लिया . वे इतना ही कह पाए , " जी साब जी ."
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद
लघुकथा
छुट्टी
" इधर मुंह करो ।" उसने लिहाफ का सरका कर मिसमिसाते हुए कहा ।
" सोने दो , नींद आ रही है ।"
" बस थोड़ी देर के लिए , प्लीज़ ......।"
" जानती हूं तुम्हारी थोड़ी देर का मतलब। आधी रात तो वैसे ही जा चुकी है । सुबह भी जल्दी उठना है ।"
" यार प्लीज ,वो तो रोज की बात है न ।"
" ये भी तो ......... ।"
" जाने दो , कम से कम एक महीना तो हो ही गया होगा ।"
" तो ठीक है, नौकरी छोड़ देती हूं ।"
" कल छुट्टी कर लेना ।"
" बॉस जिंदा चबा जाएगा ,अगले दिन ।"
" ओफ़ हो , तुम तो समझती ही नहीं हो !"
" ठीक कहते हो । समझना तो मुझे ही पड़ेगा , यही न !"
वो उदास होकर करवट बदलने को हुआ तो उसने ,उसे रोकते हुए हाथ बढ़ा कर नाइट बल्ब की रोशनी गुल कर दी और बोली , " ज्यादा देर मत लगाना । मैं छुट्टी नहीं ले सकती । "
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद
लघुकथा
पैसठ पार
" पैसठ पार कर जाओगे इस महीने ।अब तो तौबा कर लो अपनी सठियानी आदतों से । "
" क्या हुआ ? "
" जब बेटा - बहू घर से निकालने की जिद करेंगे ,तब सुधारोगे खुद को । "
" मेरा बेटा ऐसा नहीं है और बहु तो सीता की प्रतिमूर्ती है ,वो एसा कभी नहीं करेंगें। "
" वो वैसा नहीं करेंगे और तुम बर्बादी की कहानियाँ लिखते रहोगे । अपनी जुए की आदत में सबकुछ गवाकर दो बार इस हवेली को गिरवी रख चुके हो ।अबकी बार वो नौबत आयी तो तय मानो कि तुम्हारा ही नहीं ,मेरा भी घर निकाला तय है । बर्दाश्त की भी कोई हद होती है।"
" क्यों लल्ला ने ने कुछ कहा है क्या ?"
" वो कहेगा तभी तुम्हारी मती को होश आयेगा । शामली सयानी हो गई है ।अब उसके ब्याह की बात सोचेगा या तुम्हारी जुए की आदत से निपटेगा ?"
" उसकी चिंता तुम क्यों करती हो ?"
" तो फिर कौन करेगा । मैं उसकी दादी हूँ , माँ समान ।"
" उसकी चिंता किसी को करने की जरूरत नहीं है । पिछली बार शामली जब दिल्ली से छुट्टी पर आईं थीं तब मैंने उसे समझाया था कि बिट्टो अपनी पसंद का लड़का ढूंढ कर अपने पापा को बता दे । मैं लल्ला को समझा दूंगां , वो वहीं तेरा ब्याह कर देगा ।इससे हम सभी दान - दहेज के चक्कर से बच जाएंगे । शामली भी लल्ला की तरह मेरी बात को तवज्जो देती है । देखना एसा ही होगा । ""
" बड़ी दूर की सोचते हो और ये सब सोचते हुए कबर में पांव लटकती हुई तुम्हारी बुद्धि को शर्म है कि आती ही नहीं । तुम्हारी जुए का आत्मघाती व्यापार चलना चाहिए ,चाहे उसके लिए पूरे घर की इज्जत धूल में मिल जाए ।"
" मैंने तो लल्ला के सर से बोझ हल्का करने के बारे में ही कोशिश की है । " कहकर उन्होंने शाल कंधे पर रखकर छड़ी उठाई और अपने नियमित अड्डे पर चलने के लिए पाँव में जूती डालने को हुए ।
" तुमने जिंदगी भर जो करना था कर लिया । अब बारी मेरी है । अगर तुमने अपनी इस घिनौनी आदत पर इसी पल से बंदिश नहीं लगाई तो तुम्हारे लिए इस घर के दरवाजे लल्ला या बहू बंद करें या न करें , मैं जरूर करूंगी ।"
उनको उम्मीद नहीं थी कि साठ से ऊपर की उनकी बुढ़िया इस उमर में चंडी का ये रूप धारण कर लेगी । उन्होंने कुछ पल तक मन ही मन न जाने क्या सोचा और फिर मन मसोस कर जूती पांवों पर चढ़ाने के विचार को त्यागने में ही अपनी भलाई समझी।उन्हें लगा कि कहीं बुढ़िया भी सठिया गयी तो बाकि की की उमर को ग्रहण लगाना तय है।
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद
दुनियादारी
" पापा , इस काढ़े के ग्राहक बढ़ते ही आपने इसकी कीमत भी बढ़ा दी ।"
" बेटे ,दुकानदारी के अपने उसूल होते हैं । वो उन्हीं से चलती है ।"
" कैसे उसूल पापा ? "
"ये काढ़ा आज उनकी जरूरत है , नहीं पियेंगे तो महामारी उनके लिए मुंह बाए खड़ी है । बड़े दिनों बाद इस काढ़े की मांग में इजाफा हुआ है ।"
बेटा अपने बाप की समझदारी को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाने को आतुर हो गया ।
" पापा ,मुझे पांच हजार रुपए दीजिए ।"
" अचानक पांच हजार ? "
" पापा ,प्लीज बहस नहीं ! नहीं देने तो न सही ।"
पुत्र उनका एकमात्र था । बहस की कोई गुंजाइश नहीं की बात हो ही चुकी थी । उन्होंने वही किया ,जो उन्हें कहा गया था । ये शायद दुनियादारी का उसूल था ।
सुरेंद्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद ।