
मनोरमा पंत
मोबाइल 9229113195
जब से घर घर कचरा एकत्रीकरण का अभियान चला , शहर तो साफ रहने लगा , पर कुछ पशु प्रेमी चिंतनशील नुमा लोग चिंतन में डूब गये।
यार! ये स्ट्रीट डागस तो भूखे मरने लगे हैं , पहले कचरे में से खाने की चीजें ढूढ़ पेट भर लेते थे पर अब?
-दूसरे ने भी चर्चा को आगे सरकाया , "बात तो ठीक है , पर आम जनता का इन मूक पशु के प्रति संवेदनशील नहीं है , कुत्तों के काटने की घटनाऐ बढ़ती जा रही हैं ।
अभी तक चुप बैठा एक चिंतक जोश में आकर बोला -"लोग समझते क्यों नहीं? भूखा प्राणी हिंसक होकर काटेगा ही। अरे!मनुष्यों तक के लिये कहा गया है -"बुभुक्षितः किं न करोति पापम् "।
अब तक सब एकमत हो गये थे कि कुत्तों को भूखा नहीं मरने देगे । गम्मीर चर्चा में तल्लीन किसी का भी ध्यान सामने हाथ फैलाएं भिखारिन की ओर नहीं गया था जो उनकी चर्चा सुन रही थी । जैसे ही उनका ध्यान भिखारिन की ओर गया वह बोल उठी -
बाबू लोग! कुत्तों के नाम दस बीस रूपये दे दो । एक सुतली से बँधा , दुम हिलाता, मरियल एक कुत्ता उसने पकड़ रखा था ।
मनोरमा पंत
आधुनिक एकलव्य
कुछ दिनों से श्याम बड़ा उदास और परेशान है।,माँ की मजदूरी से ही दोनों का पेट भरता है और माँ ने तो बिस्तर पकड़ लिया ,
गाँव के वैद्यजी कहते हैं ,हार्निया है ,शहर ले जाना पड़ेगा ।न पैसा, न साधन ।,परीक्षा भी सिर पर ,।सोचा रहा है कि फिर से सबसे अधिक अंक आ गऐ तो आगे पढने को वजीफा मिल जावेगा ।इसी उधेड़बुन में वह फँसा था कि हेडमास्टर ने उसे आवाज देकर बुलाया और कहा -अपनी माँ का इलाज कराना चाहते हो?
गदगद स्वर में रूद्धे गले से कहा -हाँ,मास्टर जी ।
मास्टर जी बोले -देख एक शर्त है ,सरपंच जी सारा इलाज करा देगे ,बस इस साल परीक्षा में न बैठ ।
चौंककर उसने पूछा -क्यों ?मेरा एक साल बर्बाद हो जावेगा ।
मास्टर जी बोले -माँ से अधिक कीमती तेरा साल है क्या ,?मास्टर जी ने समझाया,सरपंच का बेटा भी होशियार है । इसबार सरपंच जी के बेटे को प्रथम लाना है ,तेरे रहते यह हो नहीं सकता ,सब जानते हैं तू ही प्रथम आऐगा ,।बोल मंजूर है
और आधुनिक एकलव्य बेबसी से गुरूदक्षिणा के लिऐ तैयार हो गया ।
मनोरमा
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कटी पतंग
अभी नीरज को गुजरे महिना भी नहीं गुजरा था ,कि सुकन्या के लिऐ उसके पिता के पास रिश्ते आने शुरु हो गये इतने तो तब भी नहीं आऐ थे जब वह कुँवारी थी ।उसके पिता असमंजस में पड़ गये कि बेटी से क्या कहे ,क्या पूछे । हर समय वहआँसू पौंछती रहती है ।समझ नहीं पा रही थी वहकि पहाड़ सी जिन्दगी अकेले कैसे बीतेगी ।आज मकर संक्रांति पर उसकी निगाह आसमान पर गई ,रंग बिरंगी सुदंर पतंगों से सजा हुआ था ,उसकी निगाहें एक लाल रंग की पतंग पर अटक गई जो आसमान में सबसे ऊपर बल खाती लहराती ,नाचती सी ऊपर और ऊपर बढती जा रही थी ,मानों क्षितिज को छूने की होड़ में है ,अचानक एक काली पतंग उपर उठती गई और अंत में उसने लाल पतंग को काट दिया ,लाल पतंग तेजी से नीचे गिरती गई औरनीचे उसे लूटने
की होड़ लगी गई ।उसे लगा कि वह भी लाल पतंग के समान शीर्ष पर जाकर कट गई है ,और उसकी बैंक मैनेजर की नौकरी के कारण लूटने वालों का मजमा लगा है ,उसने उसी समय दृढ निश्चय कर लिया कि वह कटी पतंग नहीं बनेगी ।
मनोरमा पंत
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लघुकथा
गुड़
आज मकर संक्रांति का पर्व है ।रामदीन अपनी कुठरिया में बैठा बैठा ही गाँव पहुँच गया ,देखा नदी के किनारे शिवालय के पास
खुले मैदान में उत्तरायण होते सूर्य की उष्मित धूप में रंगबिरंगी पतंगे उड़ रही है ।एक लाल रंग की पतंग बहुत दूर आसमान में
लहरा रही है ,अकेली ,मदमस्त ,न किसी से कटने का डर न गोते खाते हुए धरती पर आना ,पर अचानक एक काली पतंग ऊँची
उठती गई और उसनेलाल पतंग को काट दिया और रामदीन चिल्लाने लगा अरे ! अरे ! ये क्या हो गया और उसका दिवा स्वप्न
टूट गया ,अरे मैं गाँव में कहाँ ,मैं तो यहाँ पत्थर दिल शहर में हूँ जहाँ आज भी आसमान सूना है ,एक भी पतंग नही दिखी उड़ते ।
गाँव के ताजा गुड़ तिल की याद करते ही उसके मुख में पानी भर आया । गुड़ ऐसा कि मुख में रखते हीघुल जाऐ । मूँगफली, तिल की गुड़ पट्टी हो या लाई गुड़ के लड्डू पूरे साल खालों ,कभी जी नहीं भरता । गरम गरम गुड़ बनते देखना का मजा ही अनोखा होता ।तापते जाओ ,बतियाते जाओ ।जबान भी तभी सबकी गुड़ जैसी मीठी ।शहर की सारी मिठाईयों एक तरफ और अकेला गुड़ दूसरी तरफ । सर्दी तो भगाता ही है ,हाजमा भी ठीक रखता है । गुड़ को याद करते करते वह पुनः गाँव पहुँच गया ।
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मनोरमा पंत
ललित जी के सुप्रभात संदेश पर लघुकथा
स्वागतम
आज जब दस नम्बर मार्केट, पोती के कर्ण छेदन हेतु रामेश्वर के पास गई ,जो एक ज्वेलर की दूकान के बाहर बैठता है ।छोटा मोटा काम करके पेट भरता है ,आते जाते पहचानने लगे एक दूसरे को।तो उसने हँसकर स्वागत किया ।मैंने भी मुस्कुरा कर पूछा - लाकडाउन के बाद में सबके चेहरे पर मायूसी दिखी ,पर तुम?हँसते हँसते बोला - हम गाँव के लोग हैं ,समस्याओ से जूझते हीरहते हैं ,नदी किनारे घर है ,बाढ का डर बना रहता ,पर घर छोड़कर नहीं जाते ।बीबी जी!समस्याओ से कैसे निपटा जाऐं यह
हम जैसे लोग अच्छी तरह जानते हैं।
मैं पूछा -लाकडाउन में कैसा अनुभव रहा ?
उसने उत्तर दिया -बेटा भोपाल में नौकरी करता था छूट गई ।हम दोनों गाँव आ गऐ l अचानक आए संकट से घबराए जरूर पर टूटे नहीं । घर के पीछे सब्जियाँ उगाई और बेची ।।हाँ एक बात बताना भूल गया ।कोरोना सकंट में मेरे बेटे ने अपना पुश्तैनी धंधा सीख लिया ,उसे समझ में आ गया कि नौकरी के साथ एक कौशल का काम आकस्मिक आपदा में काम आता है ।
एक छोटे से धंधे में लगे परिवार ने जिन्दगी का पाठ पढा दिया कि समस्याओ से डरे नहीं , पहला हम उन्हें हल करने की क्षमताओं की खोज करते हैं ।दूसरा हमें उनसे भविष्य में बचने काअनुभव प्राप्त होता है ।
मनोरमा पंत
भोपाल
लघुकथा
सम्मोहन
आज जैसे ही वसुधा ने खिड़की खोली ,सामने अरसे से बंद मकान की खिड़की पर खड़े एक युवा पर उसकी नजर पड़ी ,उसे देखकर उसने अपना हाथ हिलाया ।उसने सहम कर फट से अपनी खिड़की बंद कर दी ।दिन में जितनी बार वह खिड़की खोलती वह खिड़की मे ही खड़ा मिलता ।पता नहीं क्या सम्मोहन था उसकी आँखों में कि वह बार बार खिड़की खोलने पर मजबूर हो रही थी ,उस ने अपने को समझाया कि न जान न पहचान ,कुछ ही घंटों मेंउसका जादू क्यों उसपर छा गया?क्या उसपर भी मेरा जादू
छा गया है ,जो मुझे देखने के लिये लगातार खिड़की पर बना हुआ है ।पर यह सब ठीक भी तो नहीं ,माँ पिताजी की निगाह पड़ेगी तो क्या सोचेगे!नहीं आज ही उसे जाकरउससे बात करनी होगी ।
जब वह उस मकान के पास पहुँची तो दरवाजे पर ताला पड़ा था ,वह अभी भी खिड़की पर खड़ा था ,उसे देखकर उसने अपनी सम्मोहन भरी मुस्कुराहट से स्वागत किया ।इशारे से उसने बताया कि वह गूंगा और अपाहिज है ।
वसुधा को सारा माजरा समझ आ गया ,उसने गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया और घर आकर अपनी खिड़की हमेशा के लिये खोल दी ।
मनोरमा पंत
भोपाल
मोबाइल 9229113195
लघुकथा
भटकाव
कोरोना ने सुरेश की जिंदगी के पहिए थाम दिऐ। बड़ी मुश्किल से उसे अपनी मन पसंद नौकरी मिली थी ,वह भी चली गई ।निराशा के गर्त में डूब कर वह गहरे अवसाद में चला गया ।अपने युवा पोते की यह दशा देखकर उसके दादा जी रात को उसकी मेज पर विवेकानंद जी की एक पुस्तक रखकर चुपचाप चले गऐ ।सुरेश ने अनमने मन से उस पुस्तक के पृष्ठ पलटे और उसके की निगाह एक पेज पर थम गई जिसमें युवाओ के भटकाके बारे में विवेकानन्द जी ने लिखा -"आत्मबल ,कौशल ,ध्येय और आत्मविश्वास युवाओ को भटकाव से बचाते हैं ।आत्मबल सबसे जरूरी हैयदि आप स्वयं को कमजोर समझते हैं तो कमजोर बनेगे ,शक्तिशाली समझेगा तो शक्तिशाली बनेगे ।आत्मसम्मान से जीवन कीकोई दिशा तय कर सकेगे , शिक्षित होने के साथ किसी कौशल में पारंगत होना जरूरी है और अंत में आत्मविश्वास से दुर्गम से दुर्गम कार्य भी सहजता से कर सकते हैं।"बस विवेकानंद की इन बातों कोपढते ही सुरेश में एक नई ऊर्जा का संचार हो गया उसने सोचा एक रास्ता बंद हो गया तो क्या दूसरे तो खुले हैं ,नौकरी गई तो क्या हुआ ,दूसरे अवसर तलाशेगा और अवसाद की गंदी चादर फेक नई सुहानी सुबह के इंतजार मेंशांत होकर सो गया ।