शनिवार, 8 मई 2021

संस्मरण (02) सुषमा तिवारी महाराष्ट्र


    गरीबी में भी कुछ लोग "खुद्दारी"  नहीं छोड़ते हैं। सुषमा तिवारी जी ने हमे एक संस्मरण भेजा है आप भी पढ़िए 


"ऐसे लोग भी होते है"  


       मौसम में बारिश का कुछ भरोसा नहीं था। थोड़ी देर पहले धूप निकली थी अचानक झमाझम शुरू हो गई। वैसे तो स्टेशन के पास ज्यादा भीड़ रहती है पर कोरोना काल के अनलॉक में पांच महीने बाद खुली फेमस वडा पाव की दुकान के आगे भी गिने चुने लोग ही थे। भाग कर मैंने भी वडा पाव के दुकान के आगे शरण ले ली थी। वही किनारे एक और आदमी खड़ा था, देखने में ठीक ठाक ही लग रहा था पर हर थोड़ी देर पर उसकी आँखे मुझपर आकर गड़ जाती थी। वो मेरी तरफ बढ़ा तो संशय में पड़ा मन सोचने लगा, 'अच्छा! शायद उसे कुछ पूछना होगा'।
" सुनिए" उसकी आवाज़ में घबराहट सी थी।
" हाँ..हाँ कहिये, क्या बात है?"
" मुझे भूख लगी है और एक...एक वडा पाव खाना था.."
ओह तो ये बात थी। पर सामने ही तो सार्वजनिक भोजनालय में मुफ्त में खाना बंट रहा था। ये पुण्य कार्य तो कोरोना आते ही शुरू हो गया था। फिर ये वहाँ क्यों नहीं खा लेता? खैर एक वडा पाव के लिए इतना सोचना भी बेमानी था। मैंने जेब से पैसे निकालते हुए दुकान वाले को दो वडा पाव देने का इशारा किया। 

" नहीं नहीं, ऐसे नहीं सर!"
उसने अपनी पीठ पर टँगा बैग उतारा और उसमे से कुछ अगरबत्तियों के पैकेट निकाले।
" सोचा था कुछेक तो बिक जाएंगे.. पर जाने दीजिए.. आप मुझसे एक पैकेट ले लेते तो मेरी भूख का इन्तेजाम हो जाता " 

मैं कुछ पलों के लिए स्तब्ध खड़ा था।
" ऐसा करो! मुझे दस पैकेट दे दो " सौ का नोट बढ़ाते हुए मैंने कहा।
अगल - बगल खड़ी छोटी सी भीड़ ने भी जो ये सब देख रही थी हाथो हाथ लपकते हुए उसके कई पैकेट खरीद लिए।
     वडा पाव खाते हुए उसके चेहरे पर संतोष के भाव और आँखें कुछ भींगी हुई सी थी। आखिर भूख मिटते समय आत्मसम्मान बना रहे ये किसे नहीं अच्छा लगेगा?

          यह अगस्त की घटना थी। जब पतिदेव घर आधे भींगे हुए घर पधारे तो हाथ में रंग बिरंगी अगरबत्ती के पैकेट देख गुस्सा दूना हो गया कि कुछ भी खरीद लाते है। फिर जब उन्होंने पूरी बात बताई तो मन में अजीब सी शांति के साथ एक सवाल पसर गया कि अब भी ऐसे लोग है जो एक वक़्त के खाने के लिए आत्मसम्मान की सोच रहे थे। आजकल तो बड़े बड़े अच्छे खासे लोग गरीबो के हक का पैसा हज़म करने से पहले नहीं सोचते है। खैर अपने-अपने कर्म!
पतिदेव की बात वो बात भी अच्छी लगी कि इंसानियत बची रहे इसके लिए जरूरी है कि सक्षम हो तो कुछ चीजे उन लोगों से बिना जरूरत भी खरीद लो।
जब आपके पास दूसरों की मदद करने के लिए पर्याप्त है, तो उस अवसर को जाने न दें।

सुषमा तिवारी 

कल्याण (महाराष्ट्र)