शनिवार, 8 मई 2021

संस्मरण (04) डॉक्टर क्षमा सिसोदिया मध्यप्रदेश

 संस्मरण 

   

 मैला आँचल 

        यह वाकया 2017 के दिसम्बर माह का है।
प्रतिदिन की तरह मैं सुबह सैर के लिए निकली ही थी, कि कुछ दूर जाने पर सड़क किनारे एक लड़की को बैठे हुए देखा।
'इतनी सुबह आखिर यह यहाँ क्यों बैठी है...?'

  'नजरें मिलने पर लड़की मुस्कुरा दी।'
उसको मुस्कुराते देख, मैं सहज हो इशारे से फिर पूछा,
"कहाँ...!! ? "
"कोचिंग जा रही हूँ।"
'लेकिन बोलने के साथ ही उसके चेहरे की रंगत उड़ गयी।'
"दिल ने तुरन्त ही दिमाग से प्रश्न किया-" आखिर इसके चेहरे की रंगत क्यों उड़ी है...?"
दिमाग को ठनकते देर नही लगी और वह वहीं पर अडिग हो गया।

'अँधेरे को चीरते हुए उजाले की किरणें अब शनैः-शनैः उसके चेहरे पर आने लगी थी, जिसकी रोशनी में उसके चेहरे के उतरते-चढ़ते भाव को स्पष्ट पढ़ा जा सकता था।'

"मैंने इशारे से फिर पूछा, कि कहाँ जा रही हो...?"

वही सवाल दुबारा पूछने से वह घबरा गयी और उसके हाथ से उसका कोचिंग बैग नीचे गिर गया। 

 ऐसा देखते ही मेरी पुलिसिया नज़र को उसे समझने में जरा भी देर नही लगी। मैं उसके पास गयी और सख्ती से बोली-
"बैग दिखाओ।"

       लड़की सीधी-सादी थी, इसलिए आसानी से बैग दिखाने लगी, उसने जैसे ही बैग का चेन खोला...,

"यह क्या... !!"

" क्यों तुम तो बोल रही थी, कि कोचिंग जा रही हो, लेकिन इसमें तो कपड़े भरे हैं ?" 

"नही मैडम, मैं अपने मौसी के घर जा रही हूँ ।" 
उसने फौरन झूठ बोला । 

"मेरे साथ मेरे भाई हैं, वो मुझे स्टेशन छोड़ देगें।" 

इतना सुनते ही मेरी आवाज थोड़ी तेज हो गई। 

"कहाँ है भाई, बुलाओ ?" 

मेरी आवाज सुनते ही दो-तीन लड़के सामने आ गये, जो पास ही गुमटी पर चाय पी रहे थे। 
"क्या है मैडम ? ये हमारी बहन है।"
"तो फिर यह झूठ क्यो बोल रही थी, कि कोचिंग जा रही हूँ ? " 

"अरे मैड़म, सुबह-सुबह काहें खिटपिट कर रहे हो, आप अपने रास्ते जाओ न।" 

      उसके आश्वस्त करने के बाद भी मेरा दिल-दिमाग उस लड़की को छोड़कर जाने को तैयार नही था।
        अब उस लड़की के ऊपर गुस्सा नही, बल्कि तरस आने लगा था, जो बार-बार यह बोलने से नही चूक रही थी कि-

"मैडम आप मुझे गलत समझ रही हैं।"   

       आने-जाने वाले लोगों से मैं मदद चाह रही थी। लेकिन सब तमाशाई बन कर तमाशा देखते और फिर आगे बढ़ जाते।

      उतनी देर में लड़कों और मेरे बीच तेज़ आवाज़ में हो रही बातों को सुन, चाय वाला ईश्वर का रूप बनकर  वहाँ आ गया, उसे देखते ही मेरे जान में जान आ गयी। 

"मैं हिम्मत करके बोली, भइया देखो, मुझे लगता है यह लड़की घर से भाग रही है।" 

सब कुछ ऐसा अचानक हो रहा था, कि मुझे कुछ सोचने का मौका ही नही मिल रहा था। 
       उसके साथ के लड़के कुछ बदमाश जैसे दिख रहे थे, तो मन में अनजाना भय भी अपना अतिक्रमण करता जा रहा था। 
'इधर मेरे हाथ में न फोन था और न ही कोई हथियार, लेकिन चायवाला दबंग था। उसने मेरे बोलने के साथ ही लड़कों से बैग छीना और अपने दुकान की तरफ चल दिया जो सड़क से थोड़ी अन्दर था ।

    लड़की की रट अभी भी वैसी ही थी, "मैडम आप मुझे गलत समझ रहे हो।" 
मैं लड़की के पास  खड़ी रही और बोली- 
"ईश्वर का शुक्र मनाओ, कि तुम बरबाद होने से बच गयी। नही तो तुम्हारी क्या दुर्गति होती उसका तुम्हें अंदाजा भी नही है।"

           कुछ देर तक तो मैं वहीं खड़ी रही, फिर वह अपने रास्ते पर चल दी।
          कुछ कदम ही आगे चलने के बाद मेरा मन एकदम से भयभीत होने लगा। 
'कहीं वे लड़के आकर मुझे ही न मारे।' 

        मैं वापस घर लौट जाती हूँ, फिर वही खड़े-खड़े ही ईश्वर से प्रार्थना की प्रभु मैंने आपका काम किया अब मेरी रक्षा आप करना और उसी अदृश्य ताकत के बल पर आगे बढ़ती चली गयी। 
        मार्निग वाक पूरा कर जब वापिस लौट कर उस रास्ते तक पहुँची, तो वहाँ पुलिस की गाड़ी और भीड़ खड़ी हुई देखी। 
लेकिन उन असभ्य लड़को की वजह से अभी तक मन में भय समाया हुआ था। भय की वजह से वहाँ जाना उचित नही समझा, क्योंकि मुझे खुद को भी सुरक्षित जो रखना था। 

         चाय वाले को मैं जानती थी इसीलिए उस पर मुझे पूरा भरोसा था, कि वह जो करेगा सही करेगा और मैं सीधे घर आ गयी। 
घर पहुँचकर जब सबको पूरा किस्सा बतायी तो सब ने मुझे ही गलत ठहराया। 

      "क्या जरूरत थी टांग अड़ाने की ? फालतू का काम करती रहती हो, डाँट लगाते हुए माँ ने झिड़की दी।" 

"ठीक है, आप लोग चुप हो जाइए। जो कुछ हुआ, अचानक हुआ है। मुझे नही पता था, कि आज रास्ते में..., मैंने कोई प्लान करके नही किया है, जो गलत/सही समझ पाती।" 

         फिर दूसरे दिन अनजाने भय वश सुबह की सैर पर नहीं गई, तो लड़की का कुछ पता नही चल पाया। 
        भय अपनी जगह पर विराजमान था लेकिन दिमाग में  वही लड़की घूमती रही..., 

"कैसे पता चलेगा, किससे पता करूँ, कि सच क्या था... ?" 

"कही मैं ही तो गलती नही थी...?" 

     दो-तीन दिन जब सुबह की सैर के लिए निकली तो पहले चाय वाले के पास गयी। 
"क्या हुआ भइया, कुछ पता चला...?" 

"मैड़म, आपने बिल्कुल सही समय पर उसे बचा लिया, चाय वाले ने हाथ जोड़ते हुए बोला।"

"क्या... !"  

"हाँ, वह लड़की घर से भाग ही रही थी और वह लड़के भाई नही, बदमाश थे। जो पहले भी कई लड़कियों को भगाकर ले गये थे।
"वह लड़की बरबाद होने से बच गई।" 

"मैं उन लड़कों को बहसबाजी में उलझा कर रखा और इतनी देर में मेरा इशारा समझ घरवाली ने 100 नंबर  डायल करके पुलिस को खबर कर दी।" 

"पुलिस के आते ही माँ-बाप को बुलाकर  लड़की को सुरक्षित उसके घर भेजा और बदमाश लड़कों को जेल।" 

      मैंने ने आसमान की ओर देखते हुए ईश्वर को धन्यवाद दिया
और भयमुक्त हो आगे अपने रास्ते पर चल दी। 

डाॅ. क्षमा सिसौदिया 






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