शुक्रवार, 7 मई 2021

संस्मरण (01) बबिता कंसल

 


नाम -बबीता कंसल 
माता ,प्रतिभा  रानी 
पिता -धर्मेंद्र मोहन  गुप्ता 
निवास स्थान- दिल्ली 
शिक्षा  -M.A - अर्थशास्त्र, इतिहास 
प्रकाशित रचनाएं अनेक पत्र, पत्रिकाओं में प्रकाशित।




बबिता कंसल 

संस्मरण 

       गाँव मे बचपन मे माँ को हमेशा सुबह उठ कर पंछीयों को दाना पानी डालते देखती थी ।
घर के आँगन में एक अमरूद का पेड़ लगा था । माँ वही  उसी के नीचे पत्थर पर एक मिट्टी के कटोरे में पानी , दाना डालती अनेक पंछी  कबुतर , तोते चिड़ीयाँ, आ दाना चुगते, और मै बहुत उत्सुकता से उनको बैठ कर निहारा करती । उन को उड़ता हुआ देखती । उन का पंखों को  फड़फड़ाना मुझे बहुत ही अच्छा लगता । वो नन्ही चिड़ियों का बोलना । लगता जैसे मुझसे ही कुछ बातें कर रही है। मन ही मन सोचा करती ऐसे पँख हमारे भी होते! कही भी उड़कर जा सकते थे । "भगवान ने आख़िर हमें क्यों नहीं दिये पंख?" 
      बचपन का वो लुभावना दृश्य बड़े होने पर मेरी दिनचर्या मे शामिल हो गया । रोज़ छत पर दाना डालना और अनेक पंछीयों का दाना चुगना । घर के सामने के घर की बालकनी से एक कबूतर का जोड़ा ,जैसे ही मै ऊपर जाती आ कर बैठ जाता । मेरे दाना डालने की इंतज़ार किये बिना ही 
अब रोज़ यही होने लगा मैं जितनी बार मैं छत पर किसी काम के लिए जाती, वो तुरन्त उड़कर मेरे इर्द गिर्द बैठ जातें । बड़ी ही निडरता से लगता 
कह रहें हो "इससे क्या डर ?"
मुझे भी बहुत अच्छा लगता।  हमेशा मेरी आँखें छत पर पहुँच कर उन को देख रही होती । एक रिश्ता जो बन गया था उनसे।
एक दिन जब छत पर गयी तो एक कबूतर को मैंने छत पर पड़ा पाया । उस के आस पास कोएं ज़ोर ज़ोर से बोल रहें थे । एक कबूतर उस कबूतर के चारों और घुम रहा था ! 
          वो उन कौओं से जैसे उसे बचा रहा हो । मुझे आया देख वो वहाँ से नहीं उड़ा ।  मेरे आसपास ही घुमने लगा । हमेशा की तरह कबूतर का जोड़ा उड़कर नहीं आया । समझ गयी ये वही कबूतर का जोड़ा है । मैंने धीरे से पड़े हुए कबूतर को  को पलट कर देखा ।उसमें प्राण नहीं थे । मन पीड़ा से भर गया । लेकिन उस साथी कबूतर की संवेदना को देख हैरान थी । साथी से बिछड़ने का दुख । और प्रेम...
            प्रेम करना जानते है पशु पक्षी भी ...। वो भी निस्वार्थ प्रेम ... 


उस कबूतर को पार्क में जा कपड़ा डाल मैने मिट्टी दे दी । उस के बाद बहुत दिन तक मन बड़ा अनमना सा रहा 
      आँखें उस जोड़े को खोजती।
क्योंकि उसके बहुत दिन बाद तक मेरे छत  पर जाते ही आने वाला कोई कबूतर का जोडा़ मुझे नज़र नहीं आता । जो मेरे इर्द गिर्द घुमे , बहुत पक्षी दाना चुगनें आते हैं।
    पर मेरी निगाहें उस कबूतर के जोड़े को ढूँढा करती । 

बबिता कंसल