अंजू खरबंदा ने दिल्ली से हमे संस्मरण भेजा है आप भी पढ़िए
ये संस्मरण मेरे दिल के बेहद करीब है, इसे शब्दों में ढालने के लिये बहुत हिम्मत जुटानी पड़ी । बाल आश्रम बहुत से सवाल छोड़ गया !
हम अपने ही बच्चों के प्रति इतने कठोर कैसे हो जाते हैं कि उन्हें लावारिस फेंक देते हैं ?
बाकी समाज उन्हें सहजता से क्यों नहीं अपनाता ?
ये कड़वाहट ही तो कई बार हिंसा का कारण बनती होगी!
काश ! हर परिवार एक एक बच्चा भी अपना ले ! तो धरती स्वर्ग हो जाए!
बाल आश्रम
इस बार माँ की बरसी पर सभी भाई बहनों ने फैसला किया कि बाल आश्रम जायेंगे । वहाँ जाने पर पता चला हाइजिन की दृष्टि से वे पका हुआ खाना नही लेते ।
"आप दाल चावल आटा तथा नवजात बच्चों के लिये सेरेलक दे सकते है ।" उन्होंने बताया ।
जब हम सामान लेकर पहुंचे तो हमारे निवेदन पर उन्होंनें हमें बच्चों से मिलवाया । पूरी तरह से अनुशासित तकरीबन दस साल तक की उम्र के कई बच्चे उस बाल आश्रम में रह रहे थे।
जब हम सामान लेकर पहुंचे तो हमारे निवेदन पर उन्होंनें हमें बच्चों से मिलवाया । पूरी तरह से अनुशासित तकरीबन दस साल तक की उम्र के कई बच्चे उस बाल आश्रम में रह रहे थे।
"आपने बताया कि नवजात शिशु भी हैं यहाँ ! क्या हम उनसे मिल सकते है !" लीना ने उत्सुकता से पूछा ।
"नहीं ! इंफेक्शन के डर से उन्हें अलग रखा जाता है ।"
"अगर हो सके तो मिलवा दे ... बड़ी मेहरबानी होगी ।" मैंने विनम्रता से कहा ।
थोड़ी मिन्नत चिरौरी के बाद वे तैयार हो गये इस ताकीद के साथ कि
"जूते चप्पल कमरे से बाहर उतार कर अंदर जाइएगा और किसी भी बच्चे को छुइएगा मत ।"
"जी ।" आज्ञाकारी बच्चों की तरह हमने हाँ मे सिर हिला दिया ।
कमरे के अंदर जाते ही हम हैरान रह गये । साफ सुथरा बड़ा सा हॉल, बड़े बड़े पालनों में सफेद झक चादरें बिछी थी और उनमें लेटे थे नन्हें नन्हें शिशु ! उन्हें देखते ही दिल धक्क से रह गया एकदम। नर्सें देखभाल में व्यस्त थी। एक पालने की ओर बरबस ध्यान गया तो देखा नीम गहरी निंद्रा में सोया नन्हा सा बालक । अनायस कदम उसकी तरफ बढ़ गये ।
नर्स ने बताया "आज सुबह ही इसे रेल की पटरी से उठा कर लाया गया है । बुखार से पूरा बदन तप रहा था । अभी दवाई देकर सुलाया है ।"
अभी हम बातें ही कर रहे थे कि वह बालक रोने लगा ।
"क्या मैं इसे उठा सकती हूं... !"
कहते हुए मेरी आवाज भर्रा गई ।
जाने क्या सोचकर नर्स ने हामी भर दी। जैसे ही मैंने उस नन्हीं सी जान को उठाकर गले से लगाया तो दिल भर आया। कुछ क्षण पश्चात नर्स उस बच्चे को वापिस लेने लगी तो उसने मेरी कमीज की बाजू कसकर थाम ली ।
"अरे अरे !" कहते हुये नर्स ने उसकी नन्हीं सी मुठ्ठी खोलने की कोशिश की। शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता कि उस समय मेरी हालत क्या थी! बस अविरल अश्रुधारा हम सभी की आँखों से बह निकली ।
अंजू खरबंदा
207 भाई परमानंद कालोनी
दिल्ली 110009
फोन 9582404164
परिचय
*नाम- अंजू खरबंदा
*पति-अशोक खरबंदा
*पिता का नाम-श्री ताराचंद भाटिया
*जन्म दिनांक- 31 अक्टूबर
*पता - 207, द्वितीय तल
भाई परमानंद कालोनी, दिल्ली 110009
*शिक्षा - स्नातक (कला)
*विधा - लघुकथा, संस्मरण व कविता
*संप्रति - अध्यापिका, लेखिका, रेडियो आर्टिस्ट
*रुचियां - साहित्य, पर्यटन, पाककला
*व्हाट्सअप नम्बर- 9582404164
