रेखा चित्र नमिता
जीवन मे घटित कुछ घटनाएं
जीवन की धारा ही बदल देती है।
संस्मरण
बात उन दिनों की है जब हमने ताजा ताजा परास्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी और जिस विद्यालय में बारहवीं तक की पढ़ाई की थी उसी में अस्थायी तौर पर ग्यारहवीं कक्षा में अंग्रेजी व्याकरण पढ़ाने हेतु हमें नियुक्ति मिली थी।
हमें जो कक्षा मिली थी उसमें अधिकतर बच्चियाँ पढ़ाई में थोड़ी कमजोर थी पर बहुत मेहनती थी। हम भी नए जोश से लबालब भरे थे तो खूब मेहनत कर के उन्हें समझाते थे। अर्द्धवार्षिक परीक्षा की कापियाँ जाँचते समय हम काफी खुश थे क्यों कि सभी बच्चियों ने अपने हिसाब से काफी अच्छा पेपर किया था पर हम विशेषतः प्रसन्न थे शिखा की कॉपी देख कर।
दूसरे दिन कक्षा में कॉपियाँ दिखाते, नम्बर बताते समय मैंने शिखा की काफी तारीफ की। पीरियड समाप्त होने के बाद हम स्टॉफ रूम में बैठे कुछ काम कर रहे थे। उस समय अन्य अध्यापिकाएं अपनी अपनी कक्षा में थी और हम अकेले ही थे। तभी शिखा वहां आई और अंदर आने की इजाजत मांगी। अंदर आने पर वह थोड़ी देर तक चुप सिर झुकाए खड़ी रही तो हमने कहा -
“हाँ शिखा! बोलो क्या बात है?”
“मैम आज आप मेरी मेहनत और सिंसयरिटी की इतनी तारीफ कर रहीं थीं पर हम उसके बिल्कुल काबिल नहीं हैं। पेपर में मैंने दो प्रश्न सुप्रिया से नकल कर के लिखे थे। मैम आप मेरे नम्बर कम कर दीजिए। हम आपके भरोसे के साथ बेईमानी नहीं कर पायेंगें। आप कितना साथ देती हैं, हम सबका।“
उसकी आंख से आंसू बह रहे थे और हम अवाक उस बच्ची के नैतिक साहस के सम्मुख नतमस्तक थे।
शिखा तो मेरे भरोसे का मान बढ़ा कर चली गयी पर हमें जीवन भर के लिए एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंप गयी कि डगर कितनी भी कठिन क्यों न हो नैतिक मूल्यों से समझौता कभी नहीं करना है। सच कहें तो शिखा के उजास ने हमें कई पड़ावों पर सम्बल दिया है।
नमिता सचान सुंदर
5/138, विकास नगर
लखनऊ- 226022

