इन्तज़ार
लघुकथा
मनोहर जी की तबियत दो-दिन से खराब है । उन के डाक्टर बेटे ने कुछ दवा बताई थी।
पर उन से बुखार पूरी तरह से नहीं उतर पा रहा था ।
क्योंकि बेटा दूसरे शहर में है । तो उन को बिना देखे हाल से ही दवा बतायी थी । जब बुखार नहीं उतर रहा तो चिन्तित हो उसने अपनें पिता को एक बड़े सरकारी हॉस्पिटल में जाकर दिखानें को कहां, और कहा कि वहां उस का नाम भी बता देना ।
मनोहर जी उसी हॉस्पिटल मे आज आये है । मरीजों की लम्बी लाइन देख हैरान है । उन का नम्बर एक घन्टे मे आ सकता है ऐसा सोच अपनी पर्ची बनाने के साथ डाक्टर बेटे का नाम बताये जाने पर कांउन्टर पर बैठी लड़की ने उन का नम्बर पहले ही लगा दिया । ये जान कर मनोहर जी बहुत खुश थे, कि चलो जैसे ही डाक्टर आयेगे नम्बर जल्दी आ जायेगा ।
"मनोहर कुमार है कोई ?" अपना नाम सुन मनोहर जी नें कहां
"मै ही हूँ मनोहर "
"तो चलिए आप का नम्बर है डाक्टर सहाब को दिखाने !"
कम्पाउन्डर ने उन को बुलातें हुए कहां
"पर मै तो देर से आया था ....!
मेरे से पहले बहुत लोग आये हैं जिन को बहुत ज्यादा तकलीफ़ है । मुझे तो मामूली बुखार है ।
मै कुछ समय बाद दिखा दूगा ।
आप पहले उन को भेज दे दिखानें के लिए "।
मनोहर जी वही कुर्सी पर बैठ अपने नम्बर आने की इन्तजार करने लगे।
बबिता कंसल
दिल्ली
